Rigveda / 7 / 72 / 1
आ गोम॑ता नासत्या॒ रथे॒नाश्वा॑वता पुरुश्च॒न्द्रेण॑ यातम् । अ॒भि वां॒ विश्वा॑ नि॒युत॑: सचन्ते स्पा॒र्हया॑ श्रि॒या त॒न्वा॑ शुभा॒ना ॥
Veda : Rigveda | Mandal : 7 | Sukta : 72 | Mantra No : 1
In English:
Seer : vasiShThaH | Devta : ashvinau | Metre : nichRRittriShTup | Tone : dhaivataH
Subject : English Translation will be uploaded as and when ready
Verse : aa gomataa naasatyaa rathenaashvaavataa purushchandreNa yaatam . abhi vaa.m vishvaa niyutaH sachante spaarhayaa shriyaa tanvaa shubhaanaa .
Component Words : aa . go.amataa . naasatyaa . rathena . ashva.avataa . puru.achandreNa . yaatam . abhi . vaam . vishvaaH . ni.ayutaH . sachante . spaarhayaa . shriyaa . tanvaa . shubhaanaa . 7.72.1
In Hindi:
ऋषि : वसिष्ठः | देवता : अश्विनौ | छन्द : निचृत्त्रिष्टुप् | स्वर : धैवतः
विषय : अब इस सूक्त में यज्ञों का वर्णन करते हुए यजमानों की प्रार्थना कथन करते हैं।
पदपाठ : आ । गोऽम॑ता । ना॒स॒त्या॒ । रथे॑न । अश्व॑ऽवता । पु॒रु॒ऽच॒न्द्रेण॑ । या॒त॒म् । अ॒भि । वा॒म् । विश्वाः॑ । नि॒ऽयुतः॑ । स॒च॒न्ते॒ । स्पा॒र्हया॑ । श्रि॒या । त॒न्वा॑ । शु॒भा॒ना ॥ ७.७२.१
पदार्थ : (नासत्या) सत्यवादी अध्यापक तथा उपदेशक (गोमता) प्रकाशवाले (अश्ववता) शीघ्रगामी (पुरुश्चन्द्रेण) अत्यन्त आनन्द उत्पन्न करनेवाले (रथेन) रथ=यान द्वारा (आयातं) हमारे यज्ञ में आयें और (श्रिया तन्वा) सुशोभित शरीर से (शुभाना) शोभा को प्राप्त हुए (वां) उनको (अभि) सब ओर से (स्पार्हया) प्रेमयुक्त (विश्वाः) सम्पूर्ण (नियुतः) स्तुतियें (सचन्ते) सङ्गत हों ॥१॥
भावार्थ : हे यजमानो ! आप लोग सदैव मन, वाणी तथा शरीर से ऐसे यत्नवान् हों, जिससे तुम्हारे यज्ञों को सत्यवादी विद्वान् आकर सुशोभित करें और आप लोग सब ओर से उनकी स्तुति करते हुए अपने आचरणों को पवित्र बनायें, क्योंकि सत्यवादी विद्वानों की सङ्गति से ही पुरुषों में उच्च भाव उत्पन्न होते हैं, अन्यथा नहीं ॥१॥
In Sanskrit:
ऋषि : वसिष्ठः | देवता : अश्विनौ | छन्द : निचृत्त्रिष्टुप् | स्वर : धैवतः
विषय : अस्मिन् सूक्ते यज्ञान् निरूपयन् यजमानस्य प्रार्थनामाह।
पदपाठ : आ । गोऽम॑ता । ना॒स॒त्या॒ । रथे॑न । अश्व॑ऽवता । पु॒रु॒ऽच॒न्द्रेण॑ । या॒त॒म् । अ॒भि । वा॒म् । विश्वाः॑ । नि॒ऽयुतः॑ । स॒च॒न्ते॒ । स्पा॒र्हया॑ । श्रि॒या । त॒न्वा॑ । शु॒भा॒ना ॥ ७.७२.१
भावार्थ :