Rigveda / 7 / 78 / 5
प्रति॑ त्वा॒द्य सु॒मन॑सो बुधन्ता॒स्माका॑सो म॒घवा॑नो व॒यं च॑ । ति॒ल्वि॒ला॒यध्व॑मुषसो विभा॒तीर्यू॒यं पा॑त स्व॒स्तिभि॒: सदा॑ नः ॥
Veda : Rigveda | Mandal : 7 | Sukta : 78 | Mantra No : 5
In English:
Seer : vasiShThaH | Devta : uShaaH | Metre : viraaTtriShTup | Tone : dhaivataH
Subject : English Translation will be uploaded as and when ready
Verse : prati tvaadya sumanaso budhantaasmaakaaso maghavaano vaya.m cha . tilvilaayadhvamuShaso vibhaatiiryuuya.m paata svastibhiH sadaa naH .
Component Words : prati . tvaa . adya . su.amanasaH . budhanta . asmaakaasaH . magha.avaanaH . vayam . cha . tilvilaayadhvam . uShasaH . vi.abhaatiiH . yuuyam . paata . svasti.abhiH . sadaa . naH . 7.78.5
In Hindi:
ऋषि : वसिष्ठः | देवता : उषाः | छन्द : विराट्त्रिष्टुप् | स्वर : धैवतः
विषय : अब ऐश्वर्य्यसम्पन्न परमात्मा की स्तुति कथन करते हुए प्रार्थना करते हैं।
पदपाठ : प्रति॑ । त्वा॒ । अ॒द्य । सु॒ऽमन॑सः । बु॒ध॒न्त॒ । अ॒स्माका॑सः । म॒घऽवा॑नः । व॒यम् । च॒ । ति॒ल्वि॒ला॒यध्व॑म् । उ॒ष॒सः॒ । वि॒ऽभा॒तीः । यू॒यम् । पा॒त॒ । स्व॒स्तिऽभिः॑ । सदा॑ । नः॒ ॥ ७.७८.५
पदार्थ : हे परमात्मन् ! (त्वा प्रति) आपके प्रति (अद्य) आज (सुमनसः) सुन्दर मनवाले विज्ञानी और (अस्माकासः) हमारे ऋत्विगादि (मघवानः) ऐश्वर्य्यसम्पन्न आपको (बुधन्त) बोधन करते (च) और (वयम्) हमलोग आपके महत्त्व को समझते हैं। हे परमात्मन् ! आप (तिल्विलायध्वं) हममें परस्पर प्रेमभाव उत्पन्न करें, क्योंकि आप (उषसः) प्रकाशरूप ज्ञान से (विभातीः) सदा प्रकाशमान हैं। (यूयं) आप (स्वस्तिभिः) स्वस्तिवाचनरूप वेदवाणियों से (नः) हमको (सदा) सदा (पात) पवित्र करें ॥५॥
भावार्थ : हे भगवन् ! आपको शान्त मनवाले योगीजन बोधन करते तथा बड़े-बड़े ऐश्वर्य्यसम्पन्न आपके यश को वर्णन करते हैं और आपकी प्रेममय रज्जू से बन्धे हुए भक्तजन आपका सदैव कीर्तन करते हैं, कृपा करके हमको कल्याणरूप वाणियों से सदा के लिए पवित्र करें ॥५॥ यह ७८वाँ सूक्त और २५वाँ वर्ग समाप्त हुआ ॥
In Sanskrit:
ऋषि : वसिष्ठः | देवता : उषाः | छन्द : विराट्त्रिष्टुप् | स्वर : धैवतः
विषय : अथैश्वर्यसम्पन्नः परमात्मा प्रार्थ्यते।
पदपाठ : प्रति॑ । त्वा॒ । अ॒द्य । सु॒ऽमन॑सः । बु॒ध॒न्त॒ । अ॒स्माका॑सः । म॒घऽवा॑नः । व॒यम् । च॒ । ति॒ल्वि॒ला॒यध्व॑म् । उ॒ष॒सः॒ । वि॒ऽभा॒तीः । यू॒यम् । पा॒त॒ । स्व॒स्तिऽभिः॑ । सदा॑ । नः॒ ॥ ७.७८.५
भावार्थ :