Rigveda / 7 / 82 / 6
म॒हे शु॒ल्काय॒ वरु॑णस्य॒ नु त्वि॒ष ओजो॑ मिमाते ध्रु॒वम॑स्य॒ यत्स्वम् । अजा॑मिम॒न्यः श्न॒थय॑न्त॒माति॑रद्द॒भ्रेभि॑र॒न्यः प्र वृ॑णोति॒ भूय॑सः ॥
Veda : Rigveda | Mandal : 7 | Sukta : 82 | Mantra No : 6
In English:
Seer : vasiShThaH | Devta : indraavaruNau | Metre : nichRRijjagatii | Tone : niShaadaH
Subject : English Translation will be uploaded as and when ready
Verse : mahe shulkaaya varuNasya nu tviSha ojo mimaate dhruvamasya yatsvam . ajaamimanyaH shnathayantamaatiraddabhrebhiranyaH pra vRRiNoti bhuuyasaH .
Component Words : mahe . shulkaaya . varuNasya . nu . tviShe . ojaH . mimaate iti . dhruvam . asya . yat . svam . ajaamim . anyaH . shnathayantam . aa . atirat . dabhrebhiH . anyaH . pra . vRRiNoti . bhuuyasaH . 7.82.6
In Hindi:
ऋषि : वसिष्ठः | देवता : इन्द्रावरुणौ | छन्द : निचृज्जगती | स्वर : निषादः
विषय :
पदपाठ : म॒हे । शु॒ल्काय॑ । वरु॑णस्य । नु । त्वि॒षे॑ । ओजः॑ । मि॒मा॒ते॒ इति॑ । ध्रु॒वम् । अ॒स्य॒ । यत् । स्वम् । अजा॑मिम् । अ॒न्यः । श्न॒थय॑न्तम् । आ । अति॑रत् । द॒भ्रेभिः॑ । अ॒न्यः । प्र । वृ॒णो॒ति॒ । भूय॑सः ॥ ७.८२.६
पदार्थ : (वरुणस्य) वारुणास्त्र का प्रयोग करनेवाला पुरुष (नु) निश्चय करके (महे, शुल्काय) बड़े ऐश्वर्य्य के लिए (त्विषे, ओजः) अपने तेज तथा बल द्वारा (मिमाते) शीघ्र ही शत्रु का (अतिरत्) हनन करता, (अस्य) उनका (यत्) जो (ध्रुवं) निश्चल (स्वं) धन है, वह (अजामिम्) शत्रु को (श्नथयन्त) नाश कर देता और (अन्यः) अन्य जो बल है, वह (अतिरत्) हनन करता है, वह (अन्यः) अन्य (दभ्रेभिः) अल्प साधनों से ही (भूयसः) बहुत से शत्रुओं को (प्र, वृणोति) भले प्रकार अपने वश में कर लेता है ॥६॥
भावार्थ : वारुणास्त्र का प्रयोग करनेवाला विद्वान् अल्प साधनों से ही शत्रुसेना का विजय करके उसकी सामग्री पर अपना अधिकार जमा लेता है। उसका शस्त्र-अस्त्ररूप धन शत्रुओं के नाश का कारण होता है अर्थात् उसके इस अपूर्व धन के सम्मुख कोई शत्रु नहीं ठहर सकता, वह अनेक शत्रुओं को विजय करके बड़ा ऐश्वर्य्यसम्पन्न होता है ॥६॥
In Sanskrit:
ऋषि : वसिष्ठः | देवता : इन्द्रावरुणौ | छन्द : निचृज्जगती | स्वर : निषादः
पदपाठ : म॒हे । शु॒ल्काय॑ । वरु॑णस्य । नु । त्वि॒षे॑ । ओजः॑ । मि॒मा॒ते॒ इति॑ । ध्रु॒वम् । अ॒स्य॒ । यत् । स्वम् । अजा॑मिम् । अ॒न्यः । श्न॒थय॑न्तम् । आ । अति॑रत् । द॒भ्रेभिः॑ । अ॒न्यः । प्र । वृ॒णो॒ति॒ । भूय॑सः ॥ ७.८२.६
भावार्थ :