Donation Appeal Download Our App
Choose Mantra
Rigveda / 7 / 83 / 5

इन्द्रा॑वरुणाव॒भ्या त॑पन्ति मा॒घान्य॒र्यो व॒नुषा॒मरा॑तयः । यु॒वं हि वस्व॑ उ॒भय॑स्य॒ राज॒थोऽध॑ स्मा नोऽवतं॒ पार्ये॑ दि॒वि ॥

Veda : Rigveda | Mandal : 7 | Sukta : 83 | Mantra No : 5

In Hindi:

ऋषि : वसिष्ठः | देवता : इन्द्रावरुणौ | छन्द : आर्चीजगती | स्वर : निषादः

विषय :

पदपाठ : इन्द्रा॑वरुणौ । अ॒भि । आ । त॒प॒न्ति॒ । मा । अ॒घानि॑ । अ॒र्यः । व॒नुषा॑म् । अरा॑तयः । यु॒वम् । हि । वस्वः॑ । उ॒भय॑स्य । राज॑थः । अध॑ । स्म॒ । नः॒ । अ॒व॒त॒म् । पार्ये॑ । दि॒वि ॥ ७.८३.५

पदार्थ : (इन्द्रावरुणौ) हे विद्यासम्पन्न राजपुरुषो ! (मा) मुझको (अर्यः) शत्रु और (अरातयः, वनुषां) हिंसक शत्रुओं के (अघानि) पापरूप शस्त्र (अभि, आतपन्ति) चारों ओर से तपाते हैं, (हि) निश्चय करके (युवं) आप लोग (वस्वः) उनका सर्वस्व हरण करके (उभयस्य, राजथः) दोनों प्रकार के बलवान् क्षत्रुओं को (अध) नीचे गिरायें और (नः, स्म, अवतं) हमारी उनसे रक्षा करते हुए (पार्ये, दिवि) विजयरूप पार को प्राप्त करायें ॥५॥

भावार्थ : परमात्मा उपदेश करते हैं कि हे इन्द्र तथा वरुणसमान युद्धविशारद विद्वानों ! तुम हिंसक तथा अन्य शत्रुओं का सर्वस्व हरण करके उनका नाश करो, जो वेदविहित मर्यादा पर चलनेवाले विद्वानों को तपाते=दुःख देते हैं। हे भगवन् ! आप ऐसी कृपा करें कि उन शत्रुओं का युद्ध में अधःपतन हो और हम विजयरूप पार को प्राप्त हों ॥५॥