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Rigveda / 7 / 83 / 7

दश॒ राजा॑न॒: समि॑ता॒ अय॑ज्यवः सु॒दास॑मिन्द्रावरुणा॒ न यु॑युधुः । स॒त्या नृ॒णाम॑द्म॒सदा॒मुप॑स्तुतिर्दे॒वा ए॑षामभवन्दे॒वहू॑तिषु ॥

Veda : Rigveda | Mandal : 7 | Sukta : 83 | Mantra No : 7

In Hindi:

ऋषि : वसिष्ठः | देवता : इन्द्रावरुणौ | छन्द : आर्षीजगती | स्वर : निषादः

विषय :

पदपाठ : दश॑ । राजा॑नः । सम्ऽइ॑ताः । अय॑ज्यवः । सु॒ऽदास॑म् । इ॒न्द्रा॒व॒रु॒णा॒ । न । यु॒यु॒धुः॒ । स॒त्या । नृ॒णाम् । अ॒द्म॒ऽसदा॑म् । उप॑ऽस्तुतिः । दे॒वाः । ए॒षा॒म् । अ॒भ॒व॒न् । दे॒वऽहू॑तिषु ॥ ७.८३.७

पदार्थ : (अयज्यवः) अवैदिक (दश, राजानः) दश राजा (समिताः) इकठ्ठे होकर (सुदासं) वेदानुयायी राजा से (न, युयुधुः) युद्ध नहीं कर सकते (देवहूतिषु) युद्धों में (अद्मसदां, देवाः) यज्ञशील विद्वान् पुरुष (एषां) इन (नृणां) वेदानुयायी पुरुषों की (सत्या) सत्यरूप से (उपस्तुतिः) स्तुति (अभवन्) करते हैं, (इन्द्रावरुणा) हे विद्यासम्पन्न राजपुरुषो ! तुम ऐसे साधनसम्पन्न पुरुषों की सहायता करो ॥७॥

भावार्थ : इस मन्त्र में यह उपदेश किया है कि राजा तथा राजकीय पुरुषों को सदा वैदिक धर्म का अनुष्ठान करना चाहिए, क्योंकि व्रत, तप तथा अनुष्ठानशील राजा को दश राजा भी मिलकर युद्ध में पराजित नहीं कर सकते, दृढ़व्रती, कर्मकाण्डी तथा धीर-वीर राजा की सब विद्वान् प्रशंसा करते और वही अपने सब कार्यों को विधिवत् करता हुआ संसार में कृतकार्य्य होता है, ऐसे धर्मज्ञ राजा की सब विद्वानों को सहायता करनी चाहिए ॥७॥