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Rigveda / 7 / 86 / 7

अरं॑ दा॒सो न मी॒ळ्हुषे॑ कराण्य॒हं दे॒वाय॒ भूर्ण॒येऽना॑गाः । अचे॑तयद॒चितो॑ दे॒वो अ॒र्यो गृत्सं॑ रा॒ये क॒वित॑रो जुनाति ॥

Veda : Rigveda | Mandal : 7 | Sukta : 86 | Mantra No : 7

In Hindi:

ऋषि : वसिष्ठः | देवता : वरुणः | छन्द : विराट्त्रिष्टुप् | स्वर : धैवतः

विषय : अब जीव ईश्वर से स्वकल्याण की प्रार्थना करता है।

पदपाठ : अर॑म् । दा॒सः । न । मी॒ळ्हुषे॑ । क॒रा॒णि॒ । अ॒हम् । दे॒वाय॑ । भूर्ण॑ये । अना॑गाः । अचे॑तयत् । अ॒चितः॑ । दे॒वः । अ॒र्यः । गृत्स॑म् । रा॒ये । क॒विऽत॑रः । जु॒ना॒ति॒ ॥ ७.८६.७

पदार्थ : (अहं) मैं (अनागाः) निष्पाप होकर (देवाय) परमात्मदेव से (दासः, न) दास के समान (अरं, कराणि) अपनी कामनाओं के लिए प्रार्थना करता हूँ, (मीळ्हुषे) वह कर्मों का फलप्रदाता (अचितः, अचेतयत्) अज्ञानियों को मार्ग बतलानेवाला (अर्यः) सबका स्वामी (देवः) दिव्यगुणस्वरूप और (कवितरः) सर्वज्ञ परमात्मा (गृत्सं) यजन करनेवालों को (राये, जुनाति) ऐश्वर्य्य की ओर प्रेरित करे ॥७॥

भावार्थ : परमात्मा के अज्ञानियों का पथप्रदर्शक होने से जीव अपने कल्याण की प्रार्थना करता हुआ यह कथन करता है कि हे परमात्मदेव ! मैं आपके निमित्त यजन करता हुआ प्रार्थी हूँ कि कृपा करके आप मेरे कल्याणार्थ मुझे ऐश्वर्य्यसम्पन्न करें ॥७॥