Rigveda / 7 / 92 / 2
प्र सोता॑ जी॒रो अ॑ध्व॒रेष्व॑स्था॒त्सोम॒मिन्द्रा॑य वा॒यवे॒ पिब॑ध्यै । प्र यद्वां॒ मध्वो॑ अग्रि॒यं भर॑न्त्यध्व॒र्यवो॑ देव॒यन्त॒: शची॑भिः ॥
Veda : Rigveda | Mandal : 7 | Sukta : 92 | Mantra No : 2
In English:
Seer : vasiShThaH | Devta : indravaayuu | Metre : viraaTtriShTup | Tone : dhaivataH
Subject : English Translation will be uploaded as and when ready
Verse : pra sotaa jiiro adhvareShvasthaatsomamindraaya vaayave pibadhyai . pra yadvaa.m madhvo agriya.m bharantyadhvaryavo devayantaH shachiibhiH .
Component Words : pra . sotaa . jiiraH . adhvareShu . asthaat . somam . indraaya . vaayave . pibadhyai . pra . yat . vaam . madhvaH . agriyam . bharanti . adhvaryavaH . deva.ayantaH . shachiibhiH . 7.92.2
In Hindi:
ऋषि : वसिष्ठः | देवता : इन्द्रवायू | छन्द : विराट्त्रिष्टुप् | स्वर : धैवतः
विषय :
पदपाठ : प्र । सोता॑ । जी॒रः । अ॒ध्व॒रेषु॑ । अ॒स्था॒त् । सोम॑म् । इन्द्रा॑य । वा॒यवे॑ । पिब॑ध्यै । प्र । यत् । वा॒म् । मध्वः॑ । अ॒ग्रि॒यम् । भर॑न्ति । अ॒ध्व॒र्यवः॑ । दे॒व॒ऽयन्तः॑ । शची॑भिः ॥ ७.९२.२
पदार्थ : (अध्वर्यवः) यज्ञों के धारण करनेवाले अध्वर्यु लोग (अध्वरेषु) यज्ञों में (सोमं) सोम रस को (अस्थात्) स्थिर करते हैं, क्योंकि (इन्द्राय) कर्मयोगी, (वायवे) ज्ञानयोगी के (पिबध्यै) पिलाने के लिए और अध्वर्यु लोग (शचीभिः) कर्मों के द्वारा (देवयन्तः) प्रार्थना करते हुए (अग्रियम्) सारभूत इस सोमरस को (भरन्ति) धारण करते हैं, (यत्) जो (मध्वं) मीठा है और (वाम्) तुम विद्वान् लोगों के निमित्त बनाया गया है ॥२॥
भावार्थ : परमात्मा उपदेश करते हैं कि हे यजमान लोगों ! तुम सुन्दर-सुन्दर पदार्थों के रस निकाल कर विद्वानों को तृप्त करो, ताकि वे प्रसन्न होकर तुमको उपदेश दें ॥२॥
In Sanskrit:
ऋषि : वसिष्ठः | देवता : इन्द्रवायू | छन्द : विराट्त्रिष्टुप् | स्वर : धैवतः
पदपाठ : प्र । सोता॑ । जी॒रः । अ॒ध्व॒रेषु॑ । अ॒स्था॒त् । सोम॑म् । इन्द्रा॑य । वा॒यवे॑ । पिब॑ध्यै । प्र । यत् । वा॒म् । मध्वः॑ । अ॒ग्रि॒यम् । भर॑न्ति । अ॒ध्व॒र्यवः॑ । दे॒व॒ऽयन्तः॑ । शची॑भिः ॥ ७.९२.२
भावार्थ :