Donation Appeal Download Our App
Choose Mantra
Rigveda / 1 / 143 / 6

कु॒विन्नो॑ अ॒ग्निरु॒चथ॑स्य॒ वीरस॒द्वसु॑ष्कु॒विद्वसु॑भि॒: काम॑मा॒वर॑त्। चो॒दः कु॒वित्तु॑तु॒ज्यात्सा॒तये॒ धिय॒: शुचि॑प्रतीकं॒ तम॒या धि॒या गृ॑णे ॥

Veda : Rigveda | Mandal : 1 | Sukta : 143 | Mantra No : 6

In Hindi:

ऋषि : दीर्घतमा औचथ्यः | देवता : अग्निः | छन्द : जगती | स्वर : निषादः

विषय : फिर उसी विषय को अगले मन्त्र में कहा है ।

पदपाठ : कु॒वित्। नः॒। अ॒ग्निः। उ॒चथ॑स्य। वीः। अस॑त्। वसुः॑। कु॒वित्। वसु॑ऽभिः। काम॑म्। आ॒ऽवर॑त्। चो॒दः। कु॒वित्। तु॒तु॒ज्यात्। सा॒तये॑। धियः॑। शुचि॑ऽप्रतीकम्। तम्। अ॒या। धि॒या। गृ॒णे॒ ॥ १.१४३.६

पदार्थ : जो (कुवित्) बड़ा (अग्निः) बिजुली आदि रूपवाला अग्निः (नः) हमारे लिये (उचथस्य) उचित पदार्थ का (वीः) व्यापक (असत्) हो वा (वसुभिः) वसानेवालों के साथ (कुवित्) बड़ा (वसुः) वसानेवाला (कामम्) काम को (आवरत्) भली भाँति स्वीकार करे वा (सातये) विभाग के लिये (कुवित्) बड़ा प्रशंसित जन (चोदः) प्रेरणा दे वा (धियः) बुद्धियों को (तुतुज्यात्) बलवती करे (तम्) उस (शुचिप्रतीकम्) पवित्र प्रतीति देनेवाले जन की (अया) इस (धिया) बुद्धि वा कर्म से (गृणे) मैं स्तुति करता हूँ ॥ ६ ॥

भावार्थ : जो बिजुली के समान उचित काम प्राप्त कराने और बुद्धि बल अत्यन्त देनेवाले बड़े प्रशंसित विद्वान् अपनी बुद्धि से सब मनुष्यों को विद्वान् करते हैं, उनकी सब लोग प्रशंसा करें ॥ ६ ॥