Donation Appeal Download Our App
Choose Mantra
Rigveda / 7 / 95 / 6

अ॒यमु॑ ते सरस्वति॒ वसि॑ष्ठो॒ द्वारा॑वृ॒तस्य॑ सुभगे॒ व्या॑वः । वर्ध॑ शुभ्रे स्तुव॒ते रा॑सि॒ वाजा॑न्यू॒यं पा॑त स्व॒स्तिभि॒: सदा॑ नः ॥

Veda : Rigveda | Mandal : 7 | Sukta : 95 | Mantra No : 6

In Hindi:

ऋषि : वसिष्ठः | देवता : सरस्वती | छन्द : आर्षीत्रिष्टुप् | स्वर : धैवतः

विषय :

पदपाठ : अ॒यम् । ऊँ॒ इति॑ । ते॒ । स॒र॒स्व॒ति॒ । वसि॑ष्ठः । द्वारौ॑ । ऋ॒तस्य॑ । सु॒ऽभ॒गे॒ । वि । आ॒व॒रित्या॑वः । वर्ध॑ । शु॒भ्रे॒ । स्तु॒व॒ते । रा॒सि॒ । वाजा॑न् । यू॒यम् । पा॒त॒ । स्व॒स्तिऽभिः॑ । सदा॑ । नः॒ ॥ ७.९५.६

पदार्थ : (सरस्वती) हे ब्रह्मविद्ये ! (अयं) यह उपासक (वसिष्ठः) विद्यागुणसम्पन्न (ते) तुम्हारे (द्वारौ) द्वारों को (शुभ्रे) हे ऐश्वर्य्य के देनेवाली अर्थात् और पारलौकिक अभ्युदय के देनेवाली वेदविद्ये ! (व्यावः) ब्रह्मवेत्ता पुरुष बोलता है, हे (शुभ्रे) कल्याणिनि ! तू (वर्ध) बढ़ (स्तुवते) जो पुरुष तुम्हारी स्तुति करते हैं, उनके लिये तथा उनको (वाजान्, रासि) सम्पूर्ण प्रकार के बल दे और (यूयं) तू (स्वस्तिभिः) मङ्गलवाणियों से उनको सदा पवित्र कर ॥६॥

भावार्थ : जो लोग विद्या को चाहते हैं और प्रतिदिन विद्या में रत हैं, उनके ब्रह्मविद्यारूप यज्ञ के दरवाजे खुल जाते हैं तथा वे सब प्रकार के सुखों को प्राप्त होते हैं ॥६॥ यह ९५वाँ सूक्त और १९वाँ वर्ग समाप्त हुआ ॥