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Rigveda / 7 / 96 / 2

उ॒भे यत्ते॑ महि॒ना शु॑भ्रे॒ अन्ध॑सी अधिक्षि॒यन्ति॑ पू॒रव॑: । सा नो॑ बोध्यवि॒त्री म॒रुत्स॑खा॒ चोद॒ राधो॑ म॒घोना॑म् ॥

Veda : Rigveda | Mandal : 7 | Sukta : 96 | Mantra No : 2

In Hindi:

ऋषि : वसिष्ठः | देवता : सरस्वती | छन्द : भुरिगार्षी | स्वर : मध्यमः

विषय :

पदपाठ : उ॒भे इति॑ । यत् । ते॒ । म॒हि॒ना । शु॒भ्रे॒ । अन्ध॑सी॒ इति॑ । अ॒धि॒ऽक्षि॒यन्ति॑ । पू॒रवः॑ । सा । नः॒ । बो॒धि॒ । अ॒वि॒त्री । म॒रुत्ऽस॑खा । चोद॑ । राधः॑ । म॒घोना॑म् ॥ ७.९६.२

पदार्थ : (शुभ्रे) हे पवित्र स्वभाववाली विद्ये ! (पूरवः) मनुष्य लोग तुम से (उभे) दो प्रकार के फल लाभ करते हैं, (यत्ते) तुम्हारे वे दोनों (अन्धसी) दिव्य हैं अर्थात् एक अभ्युदय और दूसरा निःश्रेयस, (सा) वह ब्रह्मविद्या (नः) हमारी (बोध्यवित्री) बोधन करनेवाली है, (मघोनां) ऐश्वर्य्य में से सर्वोपरि ऐश्वर्य्य (राधः) जो धनरूप है, हे विद्ये ! तू वह (चोद) हमको दे ॥२॥

भावार्थ :