Donation Appeal Download Our App
Choose Mantra
Rigveda / 7 / 99 / 6

इ॒यं म॑नी॒षा बृ॑ह॒ती बृ॒हन्तो॑रुक्र॒मा त॒वसा॑ व॒र्धय॑न्ती । र॒रे वां॒ स्तोमं॑ वि॒दथे॑षु विष्णो॒ पिन्व॑त॒मिषो॑ वृ॒जने॑ष्विन्द्र ॥

Veda : Rigveda | Mandal : 7 | Sukta : 99 | Mantra No : 6

In Hindi:

ऋषि : वसिष्ठः | देवता : इन्द्राविष्णू | छन्द : विराट्त्रिष्टुप् | स्वर : धैवतः

विषय :

पदपाठ : इ॒यम् । म॒नी॒षा । बृ॒ह॒ती । बृ॒हन्ता॑ । उ॒रु॒ऽक्र॒मा । त॒वसा॑ । व॒र्धय॑न्ती । र॒रे । वा॒म् । स्तोम॑म् । वि॒दथे॑षु । वि॒ष्णो॒ इति॑ । पिन्व॑तम् । इषः॑ । वृ॒जने॑षु । इ॒न्द्र॒ ॥ ७.९९.६

पदार्थ : (बृहन्तोरुक्रमा) हे अनन्तशक्ते परमात्मन् ! (इयं) यह (मनीषा) बुद्धि (बृहती) जो न्याय की रक्षा के लिये सबसे बड़ी है, (तवसा) बल देकर (वर्धयन्ती) बढ़ाती है, इसलिये (विष्णो) हे परमात्मन् ! (वां) आपकी यह (स्तोमं) स्तुति हम (ररे) कहते हैं, ताकि (विदथेषु) यज्ञों और (वृजनेषु) युद्धों में (इन्द्र) हे परमात्मन् ! (इषः) हमारे ऐश्वर्य्य को आप (पिन्वतं) बढ़ाएँ ॥६॥

भावार्थ : जो ऐश्वर्य के बढ़ानेवाली इस वाणी को सेवन करते हैं अर्थात् (ब्रह्मयज्ञ) ईश्वरोपासना (और वीरयज्ञ) अन्याय के दमन करने के लिये वीरता करना, इस प्रकार भक्तिभाव और वीरभाव इन दोनों का अनुष्ठान करते हैं, वे सब प्रकार की विपत्तियों को नाश कर सकते हैं ॥६॥