Donation Appeal Download Our App
Choose Mantra
Rigveda / 7 / 104 / 10

यो नो॒ रसं॒ दिप्स॑ति पि॒त्वो अ॑ग्ने॒ यो अश्वा॑नां॒ यो गवां॒ यस्त॒नूना॑म् । रि॒पुः स्ते॒नः स्ते॑य॒कृद्द॒भ्रमे॑तु॒ नि ष ही॑यतां त॒न्वा॒३॒॑ तना॑ च ॥

Veda : Rigveda | Mandal : 7 | Sukta : 104 | Mantra No : 10

In Hindi:

ऋषि : वसिष्ठः | देवता : अग्निः | छन्द : निचृत्त्रिष्टुप् | स्वर : धैवतः

विषय :

पदपाठ : यः । नः॒ । रस॑म् । दिप्स॑ति । पि॒त्वः । अ॒ग्ने॒ । यः । अश्वा॑नाम् । यः । गवा॑म् । यः । त॒नूना॑म् । रि॒पुः । स्ते॒नः । स्ते॒य॒ऽकृत् । द॒भ्रम् । ए॒तु॒ । नि । सः । ही॒य॒ता॒म् । त॒न्वा॑ । तना॑ । च॒ ॥ ७.१०४.१०

पदार्थ : (अग्ने) हे तेजःस्वरूप परमात्मन् ! (यः) जो राक्षस (नः) हमारे (पित्वः) अन्न के (रसम्) रसको (दिप्सति) नष्ट करना चाहता है और (यः) जो (अश्वानाम्) घोड़ों के तथा (यः, गवाम्) जो गौओं के तथा (यः, तनूनाम्) जो शरीर के रस अर्थात् बल को नष्ट करना चाहता है, वह (रिपुः) अहिताभिलाषी (स्तेनः) चोर तथा (स्तेयकृत्) छिप कर हानि करनेवाला (दभ्रम्, एतु) नाश को प्राप्त हो (सः) और वह दुष्ट (तन्वा) अपने शरीर से तथा (तना) दुष्कर्मी सन्तानों से (नि, हीयताम्) नष्ट हो जाय ॥१०॥

भावार्थ : हे ज्ञानस्वरूप परमात्मन् ! आप ऐसे राक्षसों को सदैव नाश को प्राप्त करें, जो धर्मचारी पुरुषों के बल, वीर्य और ऐश्वर्य को छिप कर वा किसी कुनीति से नाश करते हैं ॥१०॥