Rigveda / 8 / 1 / 16
आ त्व१॒॑द्य स॒धस्तु॑तिं वा॒वातु॒: सख्यु॒रा ग॑हि । उप॑स्तुतिर्म॒घोनां॒ प्र त्वा॑व॒त्वधा॑ ते वश्मि सुष्टु॒तिम् ॥
Veda : Rigveda | Mandal : 8 | Sukta : 1 | Mantra No : 16
In English:
Seer : medhaatithimedhyaatithii kaaNvau | Devta : indra: | Metre : aarchiibhurigbRRihatii | Tone : madhyamaH
Subject : English Translation will be uploaded as and when ready
Verse : aa tva1dya sadhastuti.m vaavaatuH sakhyuraa gahi . upastutirmaghonaa.m pra tvaavatvadhaa te vashmi suShTutim .
Component Words : aa . tu . adya . sadha.astutim . vavaatuH . sakhyuH . aa . gahi . upa.astutiH . maghonaam . pra . tvaa . avatu . adha . te . vashmi . su.astutim . 8.1.16
In Hindi:
ऋषि : मेधातिथिमेध्यातिथी काण्वौ | देवता : इन्द्र: | छन्द : आर्चीभुरिग्बृहती | स्वर : मध्यमः
विषय : अब प्रत्येक शुभकार्य के प्रारम्भ में परमात्मा की उपासना करना कथन करते हैं।
पदपाठ : आ । तु । अ॒द्य । स॒धऽस्तु॑तिम् । व॒वातुः॑ । सख्युः॑ । आ । ग॒हि॒ । उप॑ऽस्तुतिः । म॒घोना॑म् । प्र । त्वा॒ । अ॒व॒तु॒ । अध॑ । ते॒ । व॒श्मि॒ । सु॒ऽस्तु॒तिम् ॥ ८.१.१६
पदार्थ : हे परमात्मन् ! (ववातुः, सख्युः) आपके भक्त और प्रिय हम लोगों की (सधस्तुतिं) समुदायस्तुति के (आ) अभिमुख होकर (अद्य) आज (तु) शीघ्र (आगहि) आकर प्राप्त हों। (मघोनां) यज्ञकर्ता हम लोगों की (उपस्तुतिः) स्तुति (त्वा) आपको (प्रावतु) प्रसन्न करे। (अध) इस समय (ते) आपकी (सुस्तुतिं) शोभनस्तुति को (वश्मि) हम चाहते हैं ॥१६॥
भावार्थ : सब मनुष्यों को चाहिये कि प्रत्येक शुभकार्य्य के पूर्व यज्ञादि द्वारा परमात्मा की प्रार्थना-उपासना करके कार्य्यारम्भ करें, क्योंकि परमात्मा अपने भक्त तथा प्रिय उपासकों के कार्य्य को निर्विघ्न समाप्त करता है, इसलिये प्रत्येक पुरुष को उसकी उपासना में प्रवृत्त रहना चाहिये ॥१६ ॥
In Sanskrit:
ऋषि : मेधातिथिमेध्यातिथी काण्वौ | देवता : इन्द्र: | छन्द : आर्चीभुरिग्बृहती | स्वर : मध्यमः
विषय : अथ प्रत्येककार्यारम्भे परमात्मप्रार्थना वर्ण्यते।
पदपाठ : आ । तु । अ॒द्य । स॒धऽस्तु॑तिम् । व॒वातुः॑ । सख्युः॑ । आ । ग॒हि॒ । उप॑ऽस्तुतिः । म॒घोना॑म् । प्र । त्वा॒ । अ॒व॒तु॒ । अध॑ । ते॒ । व॒श्मि॒ । सु॒ऽस्तु॒तिम् ॥ ८.१.१६
भावार्थ :