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Rigveda / 8 / 1 / 23

एन्द्र॑ याहि॒ मत्स्व॑ चि॒त्रेण॑ देव॒ राध॑सा । सरो॒ न प्रा॑स्यु॒दरं॒ सपी॑तिभि॒रा सोमे॑भिरु॒रु स्फि॒रम् ॥

Veda : Rigveda | Mandal : 8 | Sukta : 1 | Mantra No : 23

In Hindi:

ऋषि : मेधातिथिमेध्यातिथी काण्वौ | देवता : इन्द्र: | छन्द : आर्चीभुरिग्बृहती | स्वर : मध्यमः

विषय :

पदपाठ : आ । इ॒न्द्र॒ । या॒हि॒ । मत्स्व॑ । चि॒त्रेण॑ । दे॒व॒ । राध॑सा । सरः॑ । न । प्रा॒सि॒ । उ॒दर॑म् । सपी॑तिऽभिः । आ । सोमे॑भिः । उ॒रु । स्फि॒रम् ॥ ८.१.२३

पदार्थ : (इन्द्र) हे ऐश्वर्य्यसम्पन्न परमात्मन् ! (आयाहि) आप अन्तःकरण में आवें (देव) हे दिव्यगुणसम्पन्न प्रभो ! (चित्रेण, राधसा) अनेकविध धनों से हमको (मत्स्व) आह्लादित करें (उरु, स्फिरं, उदरं) अति विशाल अपने उदररूप ब्रह्माण्डों को (सोमेभिः, सपीतिभिः) सौम्य सार्वजनिक तृप्तियों से (सरः, न) सरोवर के समान (आप्रासि) पूरित करें ॥२३॥

भावार्थ : इस मन्त्र में उपासक की ओर से सर्वैश्वर्य्यसम्पन्न परमात्मा से प्रार्थना है कि हे प्रभो ! आप हमारी शुभकामनाओं को पूर्ण करें और अनेकविध धनों से हमें सम्पन्न करते रहें, ताकि हम आपके गुणों का गान करते हुए आपकी उपासना में तत्पर रहें ॥२३ ॥