Rigveda / 8 / 1 / 25
आ त्वा॒ रथे॑ हिर॒ण्यये॒ हरी॑ म॒यूर॑शेप्या । शि॒ति॒पृ॒ष्ठा व॑हतां॒ मध्वो॒ अन्ध॑सो वि॒वक्ष॑णस्य पी॒तये॑ ॥
Veda : Rigveda | Mandal : 8 | Sukta : 1 | Mantra No : 25
In English:
Seer : medhaatithimedhyaatithii kaaNvau | Devta : indra: | Metre : nichRRidbRRihatii | Tone : madhyamaH
Subject : English Translation will be uploaded as and when ready
Verse : aa tvaa rathe hiraNyaye harii mayuurashepyaa . shitipRRiShThaa vahataa.m madhvo andhaso vivakShaNasya piitaye .
Component Words : aa . tvaa . rathe . hiraNyaye . harii iti . mayuura.ashepyaa . shiti.apRRiShThaa . vahataam . madhvaH . andhasaH . vivakShaNasya . piitaye . 8.1.25
In Hindi:
ऋषि : मेधातिथिमेध्यातिथी काण्वौ | देवता : इन्द्र: | छन्द : निचृद्बृहती | स्वर : मध्यमः
विषय : अब ईश्वर को अचिन्त्य प्रकृतिवाला कथन करते हैं।
पदपाठ : आ । त्वा॒ । रथे॑ । हि॒र॒ण्यये॑ । हरी॒ इति॑ । म॒यूर॑ऽशेप्या । शि॒ति॒ऽपृ॒ष्ठा । व॒ह॒ता॒म् । मध्वः॑ । अन्ध॑सः । वि॒वक्ष॑णस्य । पी॒तये॑ ॥ ८.१.२५
पदार्थ : (हिरण्यये, रथे) इस देदीप्यमान ब्रह्माण्ड में (मयूरशेप्या) मयूरपिच्छ के समान गम्भीर गतिवाली (हरी) आपकी आकर्षण तथा विकर्षण शक्तियें (शितिपृष्ठा) जिनकी तीक्ष्णगति है, वे (मध्वः) मधुर (अन्धसः) ब्रह्मानन्दार्थ (विवक्षणस्य) प्राप्तव्य (पीतये) तृप्ति के लिये (त्वा) आपको (आ, वहतां) अभिमुख करें ॥२५॥
भावार्थ : इस मन्त्र में परमात्मा को अचिन्त्यशक्तिशाली वर्णन किया गया है अर्थात् उसके पारावार को पहुँचना सर्वथा असम्भव है, इसी अभिप्राय से यहाँ मयूरपिच्छ के दृष्टान्त से भलीभाँति स्पष्ट किया गया है कि जिस प्रकार मयूर के बर्ह=पिच्छ में नाना वर्ण की कोई इयत्ता नहीं कर सकता, इसी प्रकार ब्रह्माण्डरूप विचित्र कार्य्यों की अवधि बाँधना मनुष्य की शक्ति से सर्वथा बाहर है ॥२५ ॥
In Sanskrit:
ऋषि : मेधातिथिमेध्यातिथी काण्वौ | देवता : इन्द्र: | छन्द : निचृद्बृहती | स्वर : मध्यमः
विषय : अथेश्वरोऽचिन्त्यरूपत्वेन वर्ण्यते।
पदपाठ : आ । त्वा॒ । रथे॑ । हि॒र॒ण्यये॑ । हरी॒ इति॑ । म॒यूर॑ऽशेप्या । शि॒ति॒ऽपृ॒ष्ठा । व॒ह॒ता॒म् । मध्वः॑ । अन्ध॑सः । वि॒वक्ष॑णस्य । पी॒तये॑ ॥ ८.१.२५
भावार्थ :