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Rigveda / 8 / 1 / 28

त्वं पुरं॑ चरि॒ष्ण्वं॑ व॒धैः शुष्ण॑स्य॒ सं पि॑णक् । त्वं भा अनु॑ चरो॒ अध॑ द्वि॒ता यदि॑न्द्र॒ हव्यो॒ भुव॑: ॥

Veda : Rigveda | Mandal : 8 | Sukta : 1 | Mantra No : 28

In Hindi:

ऋषि : मेधातिथिमेध्यातिथी काण्वौ | देवता : इन्द्र: | छन्द : पाद्निचृत्पथ्याबृहती | स्वर : मध्यमः

विषय : अब परमात्मा का अनन्तबल कथन करते हैं।

पदपाठ : त्वम् । पुर॑म् । च॒रि॒ष्ण्व॑म् । व॒धैः । शुष्ण॑स्य । सम् । पि॒ण॒क् । त्वम् । भाः । अनु॑ । च॒रः॒ । अध॑ । द्वि॒ता । यत् । इ॒न्द्र॒ । हव्यः॑ । भुवः॑ ॥ ८.१.२८

पदार्थ : (इन्द्र) हे परमात्मन् ! (त्वं) आप (शुष्णस्य) शत्रु के (चरिष्ण्वं) चरणशील (पुरं) समुदाय को (वधैः) अपनी हननशील शक्तियों से (सं, पिणक्) नष्ट करते हो (अध) और (त्वं) आप (भाः) दीप्ति में (अनुचरः) अनुप्रविष्ट हो (यत्) जिससे (द्विता) ज्ञानकर्म द्वारा (हव्यः) भजनीय (भुवः) हो रहे हो ॥२८॥

भावार्थ : इस मन्त्र में परमात्मा को अनन्त बलशाली कथन किया गया है कि वह परमात्मा अपनी हननशील शक्तियों से शत्रुओं के समूह को नष्ट करता, वह सम्पूर्ण ज्योतियों में प्रविष्ट होकर प्रकाशित कर रहा है और वही सारे ब्रह्माण्डों को रचकर अपनी शक्ति से सबको थांभ रहा है, अधिक क्या परमात्मा ही की शक्ति से सूर्य्य तथा विद्युदादि तेजस्वी पदार्थ अनेक कर्मों के उत्पादन तथा विनाश में समर्थ होते हैं और वह सदाचारी को सुखद तथा दुराचारी को दुःखदरूप से उपस्थित होता है, अतएव पुरुष को उचित है कि सदाचार द्वारा परमात्मपरायण हो ॥२८ ॥