Rigveda / 8 / 1 / 32
य ऋ॒ज्रा मह्यं॑ माम॒हे स॒ह त्व॒चा हि॑र॒ण्यया॑ । ए॒ष विश्वा॑न्य॒भ्य॑स्तु॒ सौभ॑गास॒ङ्गस्य॑ स्व॒नद्र॑थः ॥
Veda : Rigveda | Mandal : 8 | Sukta : 1 | Mantra No : 32
In English:
Seer : aasa~NgaH plaayogiH | Devta : aasa.m~Ngasya daanastutiH | Metre : aarchiibhurigbRRihatii | Tone : madhyamaH
Subject : English Translation will be uploaded as and when ready
Verse : ya RRIjraa mahya.m maamahe saha tvachaa hiraNyayaa . eSha vishvaanyabhyastu saubhagaasa~Ngasya svanadrathaH .
Component Words : yaH . RRIjraa . mahyam . mamahe . saha . tvachaa . hiraNyayaa . eShaH . vishvaani . abhi . astu . saubhagaa . aasa~Ngasya . svanat.arathaH . 8.1.32
In Hindi:
ऋषि : आसङ्गः प्लायोगिः | देवता : आसंङ्गस्य दानस्तुतिः | छन्द : आर्चीभुरिग्बृहती | स्वर : मध्यमः
विषय : अब ऐश्वर्य्याभिलाषियों के लिये ज्ञानोत्पादन करने का कथन करते हैं।
पदपाठ : यः । ऋ॒ज्रा । मह्य॑म् । म॒म॒हे । स॒ह । त्व॒चा । हि॒र॒ण्यया॑ । ए॒षः । विश्वा॑नि । अ॒भि । अ॒स्तु॒ । सौभ॑गा । आ॒स॒ङ्गस्य॑ । स्व॒नत्ऽर॑थः ॥ ८.१.३२
पदार्थ : (यः) जो परमात्मा (मह्यं) मेरे लिये (हिरण्यया, त्वचा) दिव्यज्ञानकारक त्वगिन्द्रिय के (सह) सहित (ऋज्रा) अनेक गतिशील पदार्थ (मामहे) देता है (एषः) यह (स्वनद्रथः) शब्दायमान ब्रह्माण्ड का स्वामी परमात्मा (आसङ्गस्य) अपने में आसक्त उपासक के (अभि) अभिमुख (विश्वानि, सौभगा) सकल शुभ ऐश्वर्यों को (अस्तु) सम्पादन करे ॥३२॥
भावार्थ : इस मन्त्र का भाव यह है कि परमात्मा ने सृष्टि में अनेकानेक विचित्र पदार्थ और उनको जानने के लिये विचित्र शक्ति प्रदान की है, अतएव ऐश्वर्य्याभिलाषी पुरुष को उचित है कि वह सर्वदा उनके ज्ञानोत्पादन का प्रयत्न करे और जो निरन्तर परमात्मा की उपासना में प्रवृत्त हुए ज्ञानप्राप्त करते हैं, उनको परमात्मा सकल ऐश्वर्य्यों का स्वामी बनाते हैं, इसलिये प्रत्येक उपासक का कर्तव्य है कि वह परमात्मा की उपासना द्वारा ज्ञान प्राप्त करे ॥३२ ॥
In Sanskrit:
ऋषि : आसङ्गः प्लायोगिः | देवता : आसंङ्गस्य दानस्तुतिः | छन्द : आर्चीभुरिग्बृहती | स्वर : मध्यमः
विषय : अथैश्वर्याभिलाषिणः ज्ञानमुत्पादयन्त्विति कथ्यते।
पदपाठ : यः । ऋ॒ज्रा । मह्य॑म् । म॒म॒हे । स॒ह । त्व॒चा । हि॒र॒ण्यया॑ । ए॒षः । विश्वा॑नि । अ॒भि । अ॒स्तु॒ । सौभ॑गा । आ॒स॒ङ्गस्य॑ । स्व॒नत्ऽर॑थः ॥ ८.१.३२
भावार्थ :