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Rigveda / 8 / 2 / 2

नृभि॑र्धू॒तः सु॒तो अश्नै॒रव्यो॒ वारै॒: परि॑पूतः । अश्वो॒ न नि॒क्तो न॒दीषु॑ ॥

Veda : Rigveda | Mandal : 8 | Sukta : 2 | Mantra No : 2

In Hindi:

ऋषि : मेधातिथिः काण्वः प्रियमेधश्चाङ्गिरसः | देवता : इन्द्र: | छन्द : आर्षीगायत्री | स्वर : षड्जः

विषय : अब सोमरस का महत्त्व वर्णन करते हैं।

पदपाठ : नृऽभिः॑ । धू॒तः । सु॒तः । अश्नैः॑ । अव्यः॑ । वारैः॑ । परि॑ऽपूतः । अश्वः॑ । न । नि॒क्तः । न॒दीषु॑ ॥ ८.२.२

पदार्थ : (नृभिः, धूतः) उक्त रस नेताओं से शोधित (सुतः) सम्यक् संस्कृत (अश्नैः, अव्यः) व्यापक बननेवाले वीरों का रक्षणीय (वारैः) वरणीय=विश्वसनीय पुरुषों द्वारा (परिपूतः) सर्वथा परीक्षित (नदीषु) जलाधारों में (निक्तः) उत्पन्न किये हुए (अश्वः, न) विद्युत् के समान शक्तिप्रद है ॥२॥

भावार्थ : यह सोमरस, जो विद्वान् वैद्यों द्वारा शोधकर तैयार किया जाता है, वह युद्धविशारद नेताओं का रक्षक होता है अर्थात् उसके पान करने से शरीर में विचित्रबल तथा ऐसी फुरती आ जाती है कि वह शत्रु पर अवश्य विजय प्राप्त करते हैं अर्थात् उक्त रसपान करने पर शूरवीर को विद्युत् के समान तेजस्वी और ओजस्वी बना देता है ॥२ ॥