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Rigveda / 8 / 2 / 11

ताँ आ॒शिरं॑ पुरो॒ळाश॒मिन्द्रे॒मं सोमं॑ श्रीणीहि । रे॒वन्तं॒ हि त्वा॑ शृ॒णोमि॑ ॥

Veda : Rigveda | Mandal : 8 | Sukta : 2 | Mantra No : 11

In Hindi:

ऋषि : मेधातिथिः काण्वः प्रियमेधश्चाङ्गिरसः | देवता : इन्द्र: | छन्द : आर्षीगायत्री | स्वर : षड्जः

विषय : अब कर्मयोगी को पुरोडाश का देना कथन करते हैं।

पदपाठ : तान् । आ॒ऽशिर॑म् । पु॒रो॒ळाश॑म् । इन्द्र॑ । इ॒मम् । सोम॑म् । श्री॒णी॒हि॒ । रे॒वन्त॑म् । हि । त्वा॒ । शृ॒णोमि॑ ॥ ८.२.११

पदार्थ : (इन्द्र) हे कर्मयोगिन् ! (तान्) उन रसों को और (आशिरं, पुरोडाशं) पय आदि से बने हुए पुरोडाशरूप (इमं, सोमं) इस शोभन भाग को (श्रीणीहि) ग्रहण करें (हि) क्योंकि (त्वां) आपको (रेवन्तं) ऐश्वर्य्यसम्पन्न (शृणोमि) सुनते हैं ॥११॥

भावार्थ : “पुरो दाश्यते दीयते इति पुरोडाशः”=जो पुरः=पहिले दाश्यते=दिया जाय, उसको “पुरोडाश” कहते हैं । याज्ञिक पुरुषों का कथन है कि हे ऐश्वर्य्यसम्पन्न कर्मयोगिन् ! पय आदि उत्तमोत्तम पदार्थों से बने हुए इस “पुरोडाश”=यज्ञशेष को आप ग्रहण करें । स्मरण रहे कि पुरोडाश को पहले देने का कारण यह है कि वह यज्ञ के हवनीय पदार्थों में सर्वोत्तम बनाया जाता है, इसलिये उसका सबसे पहले देने का विधान है ॥११ ॥