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Rigveda / 8 / 2 / 14

उ॒क्थं च॒न श॒स्यमा॑न॒मगो॑र॒रिरा चि॑केत । न गा॑य॒त्रं गी॒यमा॑नम् ॥

Veda : Rigveda | Mandal : 8 | Sukta : 2 | Mantra No : 14

In Hindi:

ऋषि : मेधातिथिः काण्वः प्रियमेधश्चाङ्गिरसः | देवता : इन्द्र: | छन्द : आर्षीगायत्री | स्वर : षड्जः

विषय :

पदपाठ : उ॒क्थम् । च॒न । श॒स्यमा॑नम् । अगोः॑ । अ॒रिः । आ । चि॒के॒त॒ । न । गा॒य॒त्रम् । गी॒यमा॑नम् ॥ ८.२.१४

पदार्थ : (अगोः, अरिः) प्रशस्त वाणीरहित असत्यवादी का शत्रु कर्मयोगी (शस्यमानं, उक्थं, चन) स्तुत्यर्ह शस्त्र को भी (आचिकेत) जानता है (न) सम्प्रति किये हुए (गीयमानं) कहे हुए (गायत्रं) स्तोत्र को भी जानता है, अतः कृतज्ञ होने से स्तोतव्य है ॥१४॥

भावार्थ : इस मन्त्र का भाव यह है कि जिस पुरुष की वाणी प्रशस्त नहीं अर्थात् जो अनृतवादी और अकर्मण्य है, वह कर्मयोगी के सन्मुख नहीं ठहर सकता, क्योंकि कर्मयोगी स्तुत्यर्ह स्तोत्रों का ज्ञाता होने से परमात्मा की आज्ञा का पूर्णतया पालन करनेवाला होता है ॥१४ ॥