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Rigveda / 8 / 2 / 19

ओ षु प्र या॑हि॒ वाजे॑भि॒र्मा हृ॑णीथा अ॒भ्य१॒॑स्मान् । म॒हाँ इ॑व॒ युव॑जानिः ॥

Veda : Rigveda | Mandal : 8 | Sukta : 2 | Mantra No : 19

In Hindi:

ऋषि : मेधातिथिः काण्वः प्रियमेधश्चाङ्गिरसः | देवता : इन्द्र: | छन्द : निचृदार्षीगायत्री | स्वर : षड्जः

विषय : अब कर्मयोगी के लिये आह्वान कथन करते हैं।

पदपाठ : ओ इति॑ । सु । प्र । या॒हि॒ । वाजे॑भिः । मा । हृ॒णी॒थाः॒ । अ॒भि । अ॒स्मान् । म॒हान्ऽइ॑व । युव॑ऽजानिः ॥ ८.२.१९

पदार्थ : हे कर्मयोगिन् ! (वाजेभिः) अपने बलों के सहित (अस्मान्, अभि) हमारे अभिमुख (सु) शोभन रीति से (प्र, उ) अवश्य (आयाहि) आवें (महान्, युवजानिः, इव) जैसे दीर्घावस्थापन्न पुरुष युवती स्त्री को उद्वाहित करके लज्जित होता है, इस प्रकार (मा, हृणीथाः) लज्जित मत हो ॥१९॥

भावार्थ : राजलक्ष्मी, जो सदा युवति है, उसका पति वयोवृद्ध=हतपुरुषार्थ तथा जीर्णावयवोंवाला पुरुष कदापि नहीं हो सकता, या यों कहो कि जिस प्रकार युवति स्त्री का पति वृद्ध हो, तो वह पुरुष सभा, समाज तथा सदाचार के नियमों से लज्जित होकर अपना शिर ऊँचा नहीं कर सकता, इसी प्रकार जो पुरुष हतोत्साह तथा शूरतादि गुणों से रहित है, वह राज्यश्रीरूप युवति का पति बनने योग्य नहीं होता । इस मन्त्र में वृद्धविवाह तथा हतोत्साह पुरुष के लिये राजलक्ष्मी की प्राप्ति दुर्घट कथन की है अर्थात् युवति स्त्री के दृष्टान्त से इस बात को बोधन किया है कि शूरवीर बनने के लिये सदा युवावस्थापन्न शौर्य्यादि भावों की आवश्यकता है ॥१९ ॥