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Rigveda / 8 / 5 / 11

वा॒वृ॒धा॒ना शु॑भस्पती दस्रा॒ हिर॑ण्यवर्तनी । पिब॑तं सो॒म्यं मधु॑ ॥

Veda : Rigveda | Mandal : 8 | Sukta : 5 | Mantra No : 11

In Hindi:

ऋषि : ब्रह्मातिथिः काण्वः | देवता : अश्विनौ | छन्द : निचृद्गायत्री | स्वर : षड्जः

विषय :

पदपाठ : वा॒वृ॒धा॒ना । शु॒भः॒ । प॒ती॒ इति॑ । दस्रा॑ । हिर॑ण्यऽवर्तनी॒ इति॒ हिर॑ण्यऽवर्तनी । पिब॑तम् । सो॒म्यम् । मधु॑ ॥ ८.५.११

पदार्थ : (शुभस्पती) हे उत्कृष्टपदार्थों के स्वामी (दस्रा) शत्रुओं का उपक्षय करनेवाले (हिरण्यवर्तनी) सुवर्णमय व्यवहारवाले ! आप (वावृधाना) अभ्युदयसम्पन्न हैं (सोम्यम्, मधु) इस शोभन मधुररस को (पिबतम्) पीजिये ॥११॥

भावार्थ : इस मन्त्र में ज्ञानयोगी तथा कर्मयोगी का स्तुतिपूर्वक सत्कार करना कथन किया है कि हे उत्तमोत्तम पदार्थों के स्वामी ! आप शत्रुओं का क्षय करनेवाले तथा अभ्युदयसम्पन्न हैं । कृपया इस उत्तम मधुर रस को, जो नाना पदार्थों से सिद्ध किया गया है, पान करके हमारे इस सत्कार को स्वीकार करें ॥११ ॥