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Rigveda / 8 / 5 / 14

अ॒स्य पि॑बतमश्विना यु॒वं मद॑स्य॒ चारु॑णः । मध्वो॑ रा॒तस्य॑ धिष्ण्या ॥

Veda : Rigveda | Mandal : 8 | Sukta : 5 | Mantra No : 14

In Hindi:

ऋषि : ब्रह्मातिथिः काण्वः | देवता : अश्विनौ | छन्द : निचृद्गायत्री | स्वर : षड्जः

विषय :

पदपाठ : अ॒स्य । पि॒ब॒त॒म् । अ॒श्वि॒ना॒ । यु॒वम् । मद॑स्य । चा॒रु॑णः । मध्वः॑ । रा॒तस्य॑ । धि॒ष्ण्या॒ ॥ ८.५.१४

पदार्थ : (धिष्ण्या) स्तुतियोग्य (अश्विना) व्यापक (युवम्) आप (रातस्य) मेरे दिये हुए (चारुणः) पवित्र (मध्वः) मधु (मदस्य) हर्षकारक (अस्य) इस सोमरस का (पिबतं) पान करें ॥१४॥

भावार्थ : हे सबको वशीभूत करनेवाले ज्ञानयोगिन् तथा कर्मयोगिन् ! आप मेरे अर्पण किये हुए इस पवित्र, मीठे तथा हर्षोत्पादक सोमरस का पान कर तृप्त हों और हम पर प्रसन्न होकर हमारी कामनाओं को पूर्ण करें ॥१४ ॥