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Rigveda / 8 / 7 / 2

यद॒ङ्ग त॑विषीयवो॒ यामं॑ शुभ्रा॒ अचि॑ध्वम् । नि पर्व॑ता अहासत ॥

Veda : Rigveda | Mandal : 8 | Sukta : 7 | Mantra No : 2

In Hindi:

ऋषि : पुनर्वत्सः काण्वः | देवता : मरूतः | छन्द : निचृद्गायत्री | स्वर : षड्जः

विषय :

पदपाठ : यत् । अ॒ङ्ग । त॒वि॒षी॒ऽय॒वः॒ । याम॑म् । शुभ्राः॑ । अचि॑ध्वम् । नि । पर्व॑ताः । अ॒हा॒स॒त॒ ॥ ८.७.२

पदार्थ : (अङ्ग) हे योद्धा लोगो ! (यद्) जब (शुभ्राः) शोभायुक्त आप (तविषीयवः) दूसरों के बल को ढूँढ़ते हुए (यामम्, अचिध्वम्) वाहनों को इकट्ठा करते हैं, तब (पर्वताः) शत्रुओं के दुर्ग (न्यहासत) काँपने लगते हैं ॥२॥

भावार्थ : सैनिक नेताओं को चाहिये कि वह उसी को सर्वोपरि दुर्ग समझें, जो साधनसामग्रीप्रधान दुर्ग है अर्थात् मनुष्यों का दुर्ग, यानों का दुर्ग और अश्वादि सेना संरक्षक पशुओं का दुर्ग सर्वोपरि कहलाता है । यहाँ पर्वत शब्द से दुर्ग का ग्रहण है, क्योंकि “पर्वाणि सन्ति अस्येति पर्वतः”=जिसके पर्व होते हैं, उसी को दुर्ग कहते हैं ॥२ ॥