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Rigveda / 8 / 8 / 4

आ नो॑ यातं दि॒वस्पर्यान्तरि॑क्षादधप्रिया । पु॒त्रः कण्व॑स्य वामि॒ह सु॒षाव॑ सो॒म्यं मधु॑ ॥

Veda : Rigveda | Mandal : 8 | Sukta : 8 | Mantra No : 4

In Hindi:

ऋषि : सध्वंशः काण्वः | देवता : अश्विनौ | छन्द : विराडार्ष्यनुष्टुप् | स्वर : गान्धारः

विषय :

पदपाठ : आ । नः॒ । या॒त॒म् । दि॒वः । परि॑ । आ । अ॒न्तरि॑क्षात् । अ॒ध॒ऽप्रि॒या॒ । पु॒त्रः । कण्व॑स्य । वा॒म् । इ॒ह । सु॒साव॑ । सो॒म्यम् । मधु॑ ॥ ८.८.४

पदार्थ : (अधप्रिया) हे मध्यदेशप्रिय सेनाध्यक्ष तथा सभाध्यक्ष ! (दिवस्परि) द्युलोक से (नः, आयातम्) आप हमारे पास आइये (अन्तरिक्षात्, आ) तथा अन्तरिक्ष से आइये (इह) इस यज्ञसदन में (कण्वस्य, पुत्रः) विद्वान् का पुत्र (वाम्) आपके लिये (सोम्यम्, मधु) शोभन मधुर रस को (सुषाव) सिद्ध कर रहा है ॥४॥

भावार्थ : हे यानों द्वारा अन्तरिक्ष में गमन करनेवाले सेनाध्यक्ष तथा सभाध्यक्ष ! आप अन्तरिक्ष से हम विद्वानों के यज्ञ को प्राप्त होकर हमारा सत्कार स्वीकार करें और हमको अन्तरिक्षलोकस्थ विद्या का उपदेश करके कृतार्थ करें ॥४ ॥