Rigveda / 8 / 8 / 20
याभि॒: कण्वं॒ मेधा॑तिथिं॒ याभि॒र्वशं॒ दश॑व्रजम् । याभि॒र्गोश॑र्य॒माव॑तं॒ ताभि॑र्नोऽवतं नरा ॥
Veda : Rigveda | Mandal : 8 | Sukta : 8 | Mantra No : 20
In English:
Seer : sadhva.mshaH kaaNvaH | Devta : ashvinau | Metre : nichRRidanuShTup | Tone : gaandhaaraH
Subject : English Translation will be uploaded as and when ready
Verse : yaabhiH kaNva.m medhaatithi.m yaabhirvasha.m dashavrajam . yaabhirgosharyamaavata.m taabhirno.avata.m naraa .
Component Words : yaabhiH . kaNvam . medha.aatithim . yaabhiH . vasham . dasha.avrajam . yaabhiH . go.asharyam . aavatam . taabhiH . naH . avatam . naraa . 8.8.20
In Hindi:
ऋषि : सध्वंशः काण्वः | देवता : अश्विनौ | छन्द : निचृदनुष्टुप् | स्वर : गान्धारः
विषय :
पदपाठ : याभिः॑ । कण्व॑म् । मेध॑ऽअतिथिम् । याभिः॑ । वश॑म् । दश॑ऽव्रजम् । याभिः॑ । गोऽश॑र्यम् । आव॑तम् । ताभिः॑ । नः॒ । अ॒व॒त॒म् । न॒रा॒ ॥ ८.८.२०
पदार्थ : (नरा) हे नेताओ ! (याभिः) जिन रक्षाओं द्वारा (मेधातिथिम्, कण्वम्) पवित्र अतिथिवाले विद्वान् की (याभिः) और जिन रक्षाओं से (वशम्, दशव्रजम्) इन्द्रियों को वश में रखनेवाले शरीरी की (याभिः) और जिनसे (गोशर्यम्) नष्टेन्द्रिय की (आवतम्) रक्षा की (ताभिः) उन्हीं रक्षाशक्तियों से (नः) मुझे (अवतम्) सुरक्षित करें ॥२०॥
भावार्थ : हे धार्मिक नेता सभाध्यक्ष तथा सेनाध्यक्ष ! जैसे आप विद्वानों की, योगीजनों की और नष्ट इन्द्रियादि अधिकारियों की रक्षा करते हैं, उसी प्रकार हमारी भी रक्षा करें, ताकि आपके आधिपत्य में हमारा विद्यावर्धक यज्ञ पूर्ण हो ॥२० ॥
In Sanskrit:
ऋषि : सध्वंशः काण्वः | देवता : अश्विनौ | छन्द : निचृदनुष्टुप् | स्वर : गान्धारः
पदपाठ : याभिः॑ । कण्व॑म् । मेध॑ऽअतिथिम् । याभिः॑ । वश॑म् । दश॑ऽव्रजम् । याभिः॑ । गोऽश॑र्यम् । आव॑तम् । ताभिः॑ । नः॒ । अ॒व॒त॒म् । न॒रा॒ ॥ ८.८.२०
भावार्थ :