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Rigveda / 8 / 9 / 14

आ नू॒नं या॑तमश्विने॒मा ह॒व्यानि॑ वां हि॒ता । इ॒मे सोमा॑सो॒ अधि॑ तु॒र्वशे॒ यदा॑वि॒मे कण्वे॑षु वा॒मथ॑ ॥

Veda : Rigveda | Mandal : 8 | Sukta : 9 | Mantra No : 14

In Hindi:

ऋषि : शशकर्णः काण्वः | देवता : अश्विनौ | छन्द : निचृद्बृहती | स्वर : मध्यमः

विषय :

पदपाठ : आ । नू॒नम् । या॒त॒म् । अ॒श्वि॒ना॒ । इ॒मा । ह॒व्यानि॑ । वा॒म् । हि॒ता । इ॒मे । सोमा॑सः । अधि॑ । तु॒र्वशे॑ । यदौ॑ । इ॒मे । कण्वे॑षु । वा॒म् । अथ॑ ॥ ८.९.१४

पदार्थ : (अश्विना) हे व्यापक ! (नूनम्) निश्चय (आयातम्) आएँ (इमा, हव्यानि) ये हव्य=भोजनार्ह पदार्थ (वाम्, हिता) आपके अनुकूल हैं (इमे, सोमासः) ये सोमरस (तुर्वशे) शीघ्र वश करनेवाले मनुष्य के यहाँ (यदौ) सामान्य जन के यहाँ (अथ) और (इमे, कण्वेषु) ये सोमरस विद्वानों के यहाँ (वाम्) आपके अनुकूल सिद्ध हुए हैं ॥१४॥

भावार्थ : हे सर्वत्र विख्यात सभाध्यक्ष तथा सेनाध्यक्ष ! आप हमको प्राप्त होकर हमारा सत्कार स्वीकार करें । हम लोगों ने आपके अनुकूल भोजन तथा सोमरस सिद्ध किया है, इसको स्वीकार कर हम पर प्रसन्न हों ॥१४ ॥