Rigveda / 8 / 9 / 18
यदु॑षो॒ यासि॑ भा॒नुना॒ सं सूर्ये॑ण रोचसे । आ हा॒यम॒श्विनो॒ रथो॑ व॒र्तिर्या॑ति नृ॒पाय्य॑म् ॥
Veda : Rigveda | Mandal : 8 | Sukta : 9 | Mantra No : 18
In English:
Seer : shashakarNaH kaaNvaH | Devta : ashvinau | Metre : viraaDanuShTup | Tone : gaandhaaraH
Subject : English Translation will be uploaded as and when ready
Verse : yaduSho yaasi bhaanunaa sa.m suuryeNa rochase . aa haayamashvino ratho vartiryaati nRRipaayyam .
Component Words : yat . uShaH . yaasi . bhaanunaa . sam . suuryeNa . rochase . aa . ha . ayam . ashvinoH . rathaH . vartiH . yaati . nRRi.apaayyam . 8.9.18
In Hindi:
ऋषि : शशकर्णः काण्वः | देवता : अश्विनौ | छन्द : विराडनुष्टुप् | स्वर : गान्धारः
विषय :
पदपाठ : यत् । उ॒षः॒ । यासि॑ । भा॒नुना॑ । सम् । सूर्ये॑ण । रो॒च॒से॒ । आ । ह॒ । अ॒यम् । अ॒श्विनोः॑ । रथः॑ । व॒र्तिः । या॒ति॒ । नृ॒ऽपाय्य॑म् ॥ ८.९.१८
पदार्थ : (उषः) हे उषादेवि ! (यत्) जब आप (भानुना, यासि) सूर्यकिरणों के साथ मिलती हो (सूर्येण, संरोचसे) और सूर्य के साथ दीप्त=लीन हो जाती हो, तब (नृपाय्यम्) शूरों से रक्षित (अयम्, अश्विनोः, रथः) यह सेनापति तथा सभाध्यक्ष का रथ (वर्त्तिः, ह, याति) अपने घर को चला जाता है ॥१८॥
भावार्थ : इस मन्त्र में यह वर्णन किया है कि सभाध्यक्ष तथा सेनाध्यक्ष उषाकाल से अपने रथों पर चढ़कर राष्ट्र का प्रबन्ध करते हुए सूर्योदय में घर को लौटते हैं, उनका प्रबन्ध राष्ट्र के लिये प्रशंसित होता है । इसी प्रकार जो पुरुष उषाकाल में जागकर अपने ऐहिक और पारलौकिक कार्यों को विधिवत् करते हैं, वे अपने मनोरथ में अवश्य कृतकार्य्य होते हैं ॥१८ ॥
In Sanskrit:
ऋषि : शशकर्णः काण्वः | देवता : अश्विनौ | छन्द : विराडनुष्टुप् | स्वर : गान्धारः
पदपाठ : यत् । उ॒षः॒ । यासि॑ । भा॒नुना॑ । सम् । सूर्ये॑ण । रो॒च॒से॒ । आ । ह॒ । अ॒यम् । अ॒श्विनोः॑ । रथः॑ । व॒र्तिः । या॒ति॒ । नृ॒ऽपाय्य॑म् ॥ ८.९.१८
भावार्थ :