Rigveda / 8 / 12 / 12
स॒निर्मि॒त्रस्य॑ पप्रथ॒ इन्द्र॒: सोम॑स्य पी॒तये॑ । प्राची॒ वाशी॑व सुन्व॒ते मिमी॑त॒ इत् ॥
Veda : Rigveda | Mandal : 8 | Sukta : 12 | Mantra No : 12
In English:
Seer : parvataH kaaNvaH | Devta : indra: | Metre : uShNik | Tone : RRIShabhaH
Subject : English Translation will be uploaded as and when ready
Verse : sanirmitrasya papratha indraH somasya piitaye . praachii vaashiiva sunvate mimiita it .
Component Words : saniH . mitrasya . paprathe . indraH . somasya . piitaye . praachii . vaashii.aiva . sunvate . mimiite . it . 8.12.12
In Hindi:
ऋषि : पर्वतः काण्वः | देवता : इन्द्र: | छन्द : उष्णिक् | स्वर : ऋषभः
विषय :
पदपाठ : स॒निः । मि॒त्रस्य॑ । प॒प्र॒थे॒ । इन्द्रः॑ । सोम॑स्य । पी॒तये॑ । प्राची॑ । वाशी॑ऽइव । सु॒न्व॒ते । मिमी॑ते । इत् ॥ ८.१२.१२
पदार्थ : (मित्रस्य) स्नेहकर्त्ता को (सनिः) इष्ट पदार्थों का देनेवाला (इन्द्रः) परमात्मा (सोमस्य, पीतये) सौम्यगुणों का अनुभव करने के लिये (पप्रथे) आविर्भूत होता है (सुन्वते) जिस प्रकार यज्ञकर्ता के लिये (प्राची वाशीव) पुरातन वेदविद्या आविर्भूत होती है और (मिमीते, इत्) वह वेदविद्या ईश्वर का प्रकाश करती है ॥१२॥
भावार्थ : जो पुरुष परमात्मा को स्नेहदृष्टि से देखते अर्थात् वेदविहित नियमों का पालन करते हैं, उन्हें परमात्मा इष्ट पदार्थों द्वारा सौम्यगुणसम्पन्न करके सुखी करते हैं, या यों कहो कि उनको वह ईश्वरीय ज्ञान प्राप्त हो जाता है, जिससे वे सब दुर्गुणों को त्यागकर सर्वदा सद्गुणों का सेवन करते हुए सुख भोगते हैं ॥१२ ॥
In Sanskrit:
ऋषि : पर्वतः काण्वः | देवता : इन्द्र: | छन्द : उष्णिक् | स्वर : ऋषभः
पदपाठ : स॒निः । मि॒त्रस्य॑ । प॒प्र॒थे॒ । इन्द्रः॑ । सोम॑स्य । पी॒तये॑ । प्राची॑ । वाशी॑ऽइव । सु॒न्व॒ते । मिमी॑ते । इत् ॥ ८.१२.१२
भावार्थ :