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Rigveda / 1 / 151 / 7

यो वां॑ य॒ज्ञैः श॑शमा॒नो ह॒ दाश॑ति क॒विर्होता॒ यज॑ति मन्म॒साध॑नः। उपाह॒ तं गच्छ॑थो वी॒थो अ॑ध्व॒रमच्छा॒ गिर॑: सुम॒तिं ग॑न्तमस्म॒यू ॥

Veda : Rigveda | Mandal : 1 | Sukta : 151 | Mantra No : 7

In Hindi:

ऋषि : दीर्घतमा औचथ्यः | देवता : मित्रावरुणौ | छन्द : जगती | स्वर : निषादः

विषय : फिर उसी विषय को अगले मन्त्र में कहते हैं ।

पदपाठ : यः। वा॒म्। य॒ज्ञैः। श॒श॒मा॒नः। ह॒। दाश॑ति। क॒विः। होता॑। यज॑ति। म॒न्म॒ऽसाध॑नः। उप॑। अह॑। तम्। गच्छ॑थः। वी॒थः। अ॒ध्व॒रम्। अच्छ॑। गिरः॑। सु॒ऽम॒तिम्। ग॒न्त॒म्। अ॒स्म॒यू इत्य॑स्म॒ऽयू ॥ १.१५१.७

पदार्थ : हे अध्यापक और उपदेशको ! (यः) जो (शशमानः) सब विषयों को पार होता हुआ (कविः) अत्यन्त बुद्धियुक्त (होता) सब विषयों को ग्रहण करनेवाला (मन्मसाधनः) जिसका विज्ञान ही साधन वह सज्जन (यज्ञैः) मिलके किये हुए कर्मों से (वाम्) तुम दोनों को सुख (दाशति) देता है और (यजति) तुम्हारा सत्कार करता है (तं, ह) उसी के (अस्मयू) हमारी इच्छा करते हुए तुम (उप, गच्छथः) सङ्ग पहुँचे हो वे आप (अह) बे रोक-टोक (अध्वरम्) हिंसारहित व्यवहार को (गन्तुम्) प्राप्त होओ और (गिरः) सुन्दर शिक्षा की हुई वाणी और (सुमतिम्) सुन्दर विशेष बुद्धि को (अच्छ) उत्तम रीति से (वीथः) चाहो ॥ ७ ॥

भावार्थ : जो इस संसार में सत्य विद्या की कामना करनेवाले सबके लिये विद्या दान से उत्तम शीलपन का सम्पादन करते हुए सुख देते हैं, वे सबको सत्कार करने योग्य हैं ॥ ७ ॥