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Rigveda / 8 / 14 / 6

वा॒वृ॒धा॒नस्य॑ ते व॒यं विश्वा॒ धना॑नि जि॒ग्युष॑: । ऊ॒तिमि॒न्द्रा वृ॑णीमहे ॥

Veda : Rigveda | Mandal : 8 | Sukta : 14 | Mantra No : 6

In Hindi:

ऋषि : गोषूक्त्यश्वसूक्तिनौ काण्वायनौ | देवता : इन्द्र: | छन्द : गायत्री | स्वर : षड्जः

विषय :

पदपाठ : वा॒वृ॒धा॒नस्य॑ । ते॒ । व॒यम् । विश्वा॑ । धना॑नि । जि॒ग्युषः॑ । ऊ॒तिम् । इ॒न्द्र॒ । आ । वृ॒णी॒म॒हे॒ ॥ ८.१४.६

पदार्थ : (इन्द्र) हे योद्धा ! (विश्वा, धनानि, जिग्युषः) सर्वविध धनों को जीतकर प्राप्त करनेवाले (वावृधानस्य) सबसे बढ़े हुए (ते) आपकी (ऊतिम्) रक्षा की (वयम्, आवृणीमहे) हम याचना करते हैं ॥६॥

भावार्थ : इस मन्त्र का तात्पर्य्य यह है कि जब वह सम्राट् प्रजा के साहाय्य से विजय प्राप्त कर सब ऐश्वर्यों को अपने अधीन कर लेता है, तब सब राष्ट्र उसी के अधीन होकर उसी से अपनी रक्षा सर्वदा चाहते और उसी को अपना स्वामी समझते हैं, अतएव राष्ट्रपति को उचित है कि सर्व प्रकार से राष्ट्र की रक्षा करने तथा उसको सुखपूर्ण करने में सदा यत्नवान् हो ॥६ ॥