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Rigveda / 8 / 14 / 8

उद्गा आ॑ज॒दङ्गि॑रोभ्य आ॒विष्कृ॒ण्वन्गुहा॑ स॒तीः । अ॒र्वाञ्चं॑ नुनुदे व॒लम् ॥

Veda : Rigveda | Mandal : 8 | Sukta : 14 | Mantra No : 8

In Hindi:

ऋषि : गोषूक्त्यश्वसूक्तिनौ काण्वायनौ | देवता : इन्द्र: | छन्द : गायत्री | स्वर : षड्जः

विषय :

पदपाठ : उत् । गाः । आ॒ज॒त् । अङ्गि॑रःऽभ्यः । आ॒विः । कृ॒ण्वन् । गुहा॑ । स॒तीः । अ॒र्वाञ्च॑म् । नु॒नु॒दे॒ । व॒लम् ॥ ८.१४.८

पदार्थ : (गुहा, सतीः) गुहा में छिपी हुई के समान (गाः) क्षात्रबलरूप विद्याओं को (आविष्कृण्वन्) प्रकट करता हुआ (अङ्गिरोभ्यः) विद्वानों के लिये (उदाजत्) बढ़ाता है, जिससे (अर्वाचम्) अभिमुख आते हुए (बलम्) शत्रुबल को (नुनुदे) अपसारण करता है ॥८॥

भावार्थ : सम्राट् को उचित है कि लुप्त हुई प्राचीन तथा अर्वाचीन क्षात्रबलवर्धक गूढ़ विद्याओं का आविष्कार करने का प्रयत्न करता रहे अर्थात् अपने सैनिकों को सिखलाता रहे, जिससे उसके सैनिक किसी शत्रु की सेना से पराभूत न हों, प्रत्युत सदैव विजय प्राप्त करते रहें ॥८ ॥