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Rigveda / 8 / 14 / 11

त्वं हि स्तो॑म॒वर्ध॑न॒ इन्द्रास्यु॑क्थ॒वर्ध॑नः । स्तो॒तॄ॒णामु॒त भ॑द्र॒कृत् ॥

Veda : Rigveda | Mandal : 8 | Sukta : 14 | Mantra No : 11

In Hindi:

ऋषि : गोषूक्त्यश्वसूक्तिनौ काण्वायनौ | देवता : इन्द्र: | छन्द : विराड्गायत्री | स्वर : षड्जः

विषय :

पदपाठ : त्वम् । हि । स्तो॒म॒ऽवर्ध॑नः । इन्द्र॑ । असि॑ । उ॒क्थ॒ऽवर्ध॑नः । स्तो॒तॄ॒णाम् । उ॒त । भ॒द्र॒ऽकृत् ॥ ८.१४.११

पदार्थ : (इन्द्र) हे योद्धा ! (त्वं, हि) आप ही (स्तोमवर्धनः) कीर्ति के बढ़ानेवाले (असि) हैं (उक्थवर्धनः) शास्त्रीय वाक् के बढ़ानेवाले आप ही हैं (उत) और (स्तोतॄणाम्) आपकी आज्ञानुसार चलनेवाले सदाचारियों के (भद्रकृत्) कल्याणकर्ता आप हैं ॥११॥

भावार्थ : राजा अपने प्रजाहितकारक सद्गुणों से प्रजा को ऐसा अनुरक्त करे कि वह अन्य राजाओं की अपेक्षा अपने राजा को ही सर्वोत्तम समझे और राजा वैदिक मार्गों का निर्विघ्न प्रसार करे, जिससे प्रजा उसकी अनुयायिनी बनकर उचित सुख का अनुभव कर सके अर्थात् अपने कर्मकाण्ड तथा धर्म में उन्नत होती हुई प्रजा के मार्गों में कोई रुकावट तथा बाधा राजा न करे, जिससे अपने धर्म में दृढ़ हुई प्रजा राष्ट्र का शुभचिन्तन करती हुई सुखी रहे ॥११ ॥