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Rigveda / 8 / 17 / 8

तु॒वि॒ग्रीवो॑ व॒पोद॑रः सुबा॒हुरन्ध॑सो॒ मदे॑ । इन्द्रो॑ वृ॒त्राणि॑ जिघ्नते ॥

Veda : Rigveda | Mandal : 8 | Sukta : 17 | Mantra No : 8

In Hindi:

ऋषि : इरिम्बिठिः काण्वः | देवता : इन्द्र: | छन्द : गायत्री | स्वर : षड्जः

विषय : अब सोमरसपान का महत्त्व कथन करते हैं।

पदपाठ : तु॒वि॒ऽग्रीवः॑ । व॒पाऽउ॑दरः । सु॒ऽबा॒हुः । अन्ध॑सः । मदे॑ । इन्द्रः॑ । वृ॒त्राणि॑ । जि॒घ्न॒ते॒ ॥ ८.१७.८

पदार्थ : (अन्धसः, मदे) सोमात्मक अन्न का आह्लाद उत्पन्न होने पर (तुविग्रीवः) विस्तीर्ण कन्धरावाला (वपोदरः) स्थूल उदरवाला (सुबाहुः, इन्द्रः) दीर्घबाहुवाला योद्धा (वृत्राणि) शत्रुसमुदायों को (जिघ्नते) हनन करता है ॥८॥

भावार्थ : इस मन्त्र का भाव यह है कि ये शूरवीर योद्धा, जो विस्तीर्ण कन्धोंवाले, बलप्रद उदरवाले और जो बड़ी भुजाओंवाले हैं, वे सोमरस का पान करके युद्ध में शत्रुओं पर विजय प्राप्त करते हैं अर्थात् सोमरसपान से आह्लाद प्राप्त होने पर परपक्ष को जीतकर विजय का नाद बजाते हुए स्वराष्ट्र की रक्षा करते हैं ॥८ ॥