Rigveda / 8 / 18 / 8
उ॒त त्या दैव्या॑ भि॒षजा॒ शं न॑: करतो अ॒श्विना॑ । यु॒यु॒याता॑मि॒तो रपो॒ अप॒ स्रिध॑: ॥
Veda : Rigveda | Mandal : 8 | Sukta : 18 | Mantra No : 8
In English:
Seer : irimbiThiH kaaNvaH | Devta : ashvinau | Metre : uShNik | Tone : RRIShabhaH
Subject : English Translation will be uploaded as and when ready
Verse : uta tyaa daivyaa bhiShajaa sha.m naH karato ashvinaa . yuyuyaataamito rapo apa sridhaH .
Component Words : uta . tyaa . daivyaa . bhiShajaa . sham . naH . karataH . ashvinaa . yuyuyaataam . itaH . rapaH . apa . sridhaH . 8.18.8
In Hindi:
ऋषि : इरिम्बिठिः काण्वः | देवता : अश्विनौ | छन्द : उष्णिक् | स्वर : ऋषभः
विषय :
पदपाठ : उ॒त । त्या । दैव्या॑ । भि॒षजा॑ । शम् । नः॒ । क॒र॒तः॑ । अ॒श्विना॑ । यु॒यु॒याता॑म् । इ॒तः । रपः॑ । अप॑ । स्रिधः॑ ॥ ८.१८.८
पदार्थ : (उत) और (त्या) वे (दैव्या) देवों में रहनेवाले (भिषजा) शारीरिक तथा बौद्धिक दोनों प्रकार के रोग को दूर करनेवाले दो प्रकार के वैद्य (अश्विना) अपने ज्ञान और क्रिया द्वारा व्यापक (नः, शम्, करतः) हमारे रोगों का शमन करें (इतः) इस निवासस्थान से (रपः) दुश्चरित्र को (युयुयाताम्) अपनयन करें (स्रिधः) विघ्नों को (अप) अपसारित करें ॥८॥
भावार्थ : इस मन्त्र का भाव यह है कि जो शारीरिक तथा आध्यात्मिक दोनों प्रकार के वैद्य ह, वे अपने ज्ञान तथा क्रिया द्वारा हमारे उक्त रोगों को शमन करें अर्थात् आध्यात्मिक, आधिभौतिक तथा आधिदैविक इन तीनों प्रकार के दुःखों को निवृत्त करके अभ्युदय प्राप्त करावें और सब विघ्नों को शान्त करते हुए हमें आध्यात्मिकता के उपदेश द्वारा हमारे दुश्चरित्र को निवृत्त करें ॥८ ॥
In Sanskrit:
ऋषि : इरिम्बिठिः काण्वः | देवता : अश्विनौ | छन्द : उष्णिक् | स्वर : ऋषभः
पदपाठ : उ॒त । त्या । दैव्या॑ । भि॒षजा॑ । शम् । नः॒ । क॒र॒तः॑ । अ॒श्विना॑ । यु॒यु॒याता॑म् । इ॒तः । रपः॑ । अप॑ । स्रिधः॑ ॥ ८.१८.८
भावार्थ :