Donation Appeal Download Our App
Choose Mantra
Rigveda / 8 / 19 / 1

तं गू॑र्धया॒ स्व॑र्णरं दे॒वासो॑ दे॒वम॑र॒तिं द॑धन्विरे । दे॒व॒त्रा ह॒व्यमोहि॑रे ॥

Veda : Rigveda | Mandal : 8 | Sukta : 19 | Mantra No : 1

In Hindi:

ऋषि : सोभरिः काण्वः | देवता : अग्निः | छन्द : निचृदुष्णिक् | स्वर : ऋषभः

विषय : अब परमात्मा के ऐश्वर्य्य का वर्णन करते हुए उसकी उपासना करने के लिये उपासक को प्रेरणा करते हैं।

पदपाठ : तम् । गू॒र्ध॒य॒ । स्वः॑ऽनरम् । दे॒वासः॑ । दे॒वम् । अ॒र॒तिम् । द॒ध॒न्वि॒रे॒ । दे॒व॒ऽत्रा । ह॒व्यम् । आ । ऊ॒हि॒रे॒ ॥ ८.१९.१

पदार्थ : हे उपासक ! (स्वर्णरम्, तम्) सबके नेता उस परमात्मा की (गूर्धय) स्तुति करो, क्योंकि (देवासः) दिव्यज्ञानवाले विद्वान् (देवम्, अरतिम्) उसी प्राप्तव्य परमात्मा को (दधन्विरे) प्राप्त करते हैं (हव्यम्) और सब कर्मों को (देवत्रा, ओहिरे) परमात्मा ही के अधीन=समर्पण करते हैं ॥१॥

भावार्थ : इस सूक्त में अग्नि शब्द वाच्य परमात्मा की हेतुदर्शनपूर्वक विविधोपासनाओं का वर्णन किया गया है । “अग्नि” शब्द का अर्थ अग्रणी=अग्रगतिवाला आदि निरुक्तोक्त जानना चाहिये कि हे उपासक लोगो ! तुम सब कर्मों के प्रारम्भ में उस परमात्मा की स्तुति करो, क्योंकि वही सब कर्मों का नेता है, वही पुरुष दिव्यज्ञानवाला तथा परम चतुर है, जो परमात्मा के शरण में प्राप्त होकर सब कर्मों को करता और अन्त में उसी के अर्पण कर देता है ॥१ ॥