Donation Appeal Download Our App
Choose Mantra
Rigveda / 8 / 19 / 17

ते घेद॑ग्ने स्वा॒ध्यो॒३॒॑ ये त्वा॑ विप्र निदधि॒रे नृ॒चक्ष॑सम् । विप्रा॑सो देव सु॒क्रतु॑म् ॥

Veda : Rigveda | Mandal : 8 | Sukta : 19 | Mantra No : 17

In Hindi:

ऋषि : सोभरिः काण्वः | देवता : अग्निः | छन्द : विराडुष्निक् | स्वर : ऋषभः

विषय :

पदपाठ : ते । घ॒ । अ॒ग्ने॒ । सु॒ऽआ॒ध्यः॑ । ये । त्वा॒ । वि॒प्र॒ । नि॒ऽद॒धि॒रे । नृ॒ऽचक्ष॑सम् । विप्रा॑सः । दे॒व॒ । सु॒ऽक्रतु॑म् ॥ ८.१९.१७

पदार्थ : (विप्र) हे ज्ञान से पूरित (देव) द्योतमान (अग्ने) परमात्मन् ! (ते, घ, इत्) वे ही निश्चय (स्वाध्यः) शोभनध्यानवाले होते हैं, (ये, विप्रासः) जो विद्वान् (नृचक्षसम्) सब मनुष्यों के द्रष्टा (सुक्रतुम्) शुभकर्मवाले (त्वा) आपको (निदधिरे) अन्तःकरण में निवासित करते हैं ॥१७॥

भावार्थ : जो परमात्मा स्वज्ञानशक्ति से सर्वत्र पूरित है, जो सूर्यादिकों में प्रविष्ट होकर सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड को प्रकाशित कर रहा है, जिसके कर्म सबसे अधिक तथा दुर्ज्ञेय हैं, उसी का शुद्धचित्त से ध्यान करके मनुष्य दीर्घकर्मों में समर्थ हो सकता है, अन्यथा नहीं ॥१७ ॥