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Rigveda / 8 / 20 / 13

येषा॒मर्णो॒ न स॒प्रथो॒ नाम॑ त्वे॒षं शश्व॑ता॒मेक॒मिद्भु॒जे । वयो॒ न पित्र्यं॒ सह॑: ॥

Veda : Rigveda | Mandal : 8 | Sukta : 20 | Mantra No : 13

In Hindi:

ऋषि : सोभरिः काण्वः | देवता : मरूतः | छन्द : निचृदुष्णिक् | स्वर : ऋषभः

विषय :

पदपाठ : येषा॑म् । अर्णः॑ । न । स॒ऽप्रथः॑ । नाम॑ । त्वे॒षम् । शश्व॑ताम् । एक॑म् । इत् । भु॒जे । वयः॑ । न । पित्र्य॑म् । सहः॑ ॥ ८.२०.१३

पदार्थ : (येषाम्) जिन योद्धाओं का (अर्णः, न, सप्रथः) जल के समान सर्वत्र फैला हुआ (त्वेषम्) दीप्त=प्रतापसहित (नाम) “भट” आदि शब्द (एकम्, इत्) अकेला ही (शश्वताम्) सकल प्रजा के (भुजे) भोग के अर्थ पर्याप्त है (न) जैसे (पित्र्यम्) पिता से लब्ध (वयः) अन्नादि (सहः) सुख से उपभोग के लिये पर्याप्त होता है ॥१३॥

भावार्थ : इस मन्त्र का भाव यह है कि जिन योद्धाओं के नाम की धाक शत्रु के हृदय को कम्पायमान कर देती और जिनके प्रताप से धर्म तथा देश अभ्युदय को प्राप्त होता है, वे योद्धा सद्वंशविभूषित हिमाचल के समान अचल रहकर धर्म तथा जाति में शिरोमणि होकर विराजमान होते हैं ॥१३ ॥