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Rigveda / 8 / 20 / 20

सा॒हा ये सन्ति॑ मुष्टि॒हेव॒ हव्यो॒ विश्वा॑सु पृ॒त्सु होतृ॑षु । वृष्ण॑श्च॒न्द्रान्न सु॒श्रव॑स्तमान्गि॒रा वन्द॑स्व म॒रुतो॒ अह॑ ॥

Veda : Rigveda | Mandal : 8 | Sukta : 20 | Mantra No : 20

In Hindi:

ऋषि : सोभरिः काण्वः | देवता : मरूतः | छन्द : निचृत्पङ्क्ति | स्वर : पञ्चमः

विषय :

पदपाठ : स॒हाः । ये । सन्ति॑ । मु॒ष्टि॒हाऽइ॑व । हव्यः॑ । विश्वा॑सु । पृ॒त्ऽसु । होतृ॑षु । वृष्णः॑ । च॒न्द्रान् । न । सु॒श्रवः॑ऽतमान् । गि॒रा । वन्द॑स्व । म॒रुतः॑ । अह॑ ॥ ८.२०.२०

पदार्थ : (विश्वासु, पृत्सु) सब संग्रामों में तथा (होतृषु) आह्वानकारक योद्धृदल में (ये) जो वीर (मुष्टिहेव, हव्यः) मुष्टियुद्ध करनेवाले आह्वान योग्य मल्ल के समान (साहाः, सन्ति) शत्रुओं को सहारनेवाले हैं (न) सम्प्रति (वृष्णः) शस्त्र-अस्त्रों की वर्षा करनेवाले (चन्द्रान्) सबके आह्लादक (सुश्रवस्तमान्) सुन्दर अत्यन्त यशवाले वीरों की (गिरा) सत्कार योग्य वाणी से (वन्दस्व, अह) स्तुति वन्दना करो ॥२०॥

भावार्थ : हे प्रजाजनो ! तुम संग्रामों में युद्ध करनेवाले तथा शत्रु के बुलाने पर युद्ध में जानेवाले योद्धाओं का सत्कार करो अर्थात् मल्लयुद्ध में निमन्त्रण देकर बुलानेवाले मल्ल के समान जो योद्धा दस्युओं तथा म्लेच्छों के हननार्थ सदा उद्यत रहते हैं, ऐसे योद्धाओं का प्रजाजनों को स्तवन=सत्कार करना धर्म है ॥२० ॥