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Rigveda / 1 / 154 / 4

यस्य॒ त्री पू॒र्णा मधु॑ना प॒दान्यक्षी॑यमाणा स्व॒धया॒ मद॑न्ति। य उ॑ त्रि॒धातु॑ पृथि॒वीमु॒त द्यामेको॑ दा॒धार॒ भुव॑नानि॒ विश्वा॑ ॥

Veda : Rigveda | Mandal : 1 | Sukta : 154 | Mantra No : 4

In Hindi:

ऋषि : दीर्घतमा औचथ्यः | देवता : विष्णुः | छन्द : निचृत्त्रिष्टुप् | स्वर : धैवतः

विषय : फिर उसी विषय को अगले मन्त्र में कहा है ।

पदपाठ : यस्य॑। त्री। पू॒र्णा। मधु॑ना। प॒दानि॑। अक्षी॑यमाणा। स्व॒धया॑। मद॑न्ति। यः। ऊँ॒ इति॑। त्रि॒ऽधातु॑। पृ॒थि॒वीम्। उ॒त। द्याम्। एकः॑। दा॒धार॑। भुव॑नानि। विश्वा॑ ॥ १.१५४.४

पदार्थ : हे मनुष्यो ! (यस्य) जिस ईश्वर के बीच (मधुना) मधुरादि गुण से (पूर्णा) पूर्ण (अक्षीयमाणा) विनाशरहित (त्री) तीन (पदानि) प्राप्त होने योग्य पद अर्थात् लोक (स्वधया) अपने-अपने रूप के धारण करने रूप क्रिया से (मदन्ति) आनन्द को प्राप्त होते हैं (यः) और जो (एकः) (उ) एक अर्थात् अद्वैत परमात्मा (पृथिवीम्) पृथिवीमण्डल (उत) और (द्याम्) सूर्यमण्डल तथा (त्रिधातु) जिनमें सत्त्व, रजस्, तमस् ये तीनों धातु विद्यमान उन (विश्वा) समस्त (भुवनानि) लोक-लोकान्तरों को (दाधार) धारण करता है, वही परमात्मा सबको मानने योग्य है ॥ ४ ॥

भावार्थ : जो अनादि कारण से सूर्य आदि के तुल्य प्रकाशमान पृथिवियों को उत्पन्न कर समस्त भोग्य पदार्थों के साथ उनका संयोग करा सबको आनन्दित करता है, उसके गुण कर्म की उपासना से आनन्द ही सबको बढ़ाना चाहिये ॥ ४ ॥