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Rigveda / 8 / 21 / 10

हर्य॑श्वं॒ सत्प॑तिं चर्षणी॒सहं॒ स हि ष्मा॒ यो अम॑न्दत । आ तु न॒: स व॑यति॒ गव्य॒मश्व्यं॑ स्तो॒तृभ्यो॑ म॒घवा॑ श॒तम् ॥

Veda : Rigveda | Mandal : 8 | Sukta : 21 | Mantra No : 10

In Hindi:

ऋषि : सोभरिः काण्वः | देवता : इन्द्र: | छन्द : विराट्पङ्क्ति | स्वर : पञ्चमः

विषय :

पदपाठ : हरि॑ऽअश्वम् । सत्ऽप॑तिम् । च॒र्ष॒णि॒ऽसह॑म् । सः । हि । स्म॒ । यः । अम॑न्दत । आ । तु । नः॒ । सः । व॒य॒ति॒ । गव्य॑म् । अश्व्य॑म् । स्तो॒तृऽभ्यः॑ । म॒घऽवा॑ । श॒तम् ॥ ८.२१.१०

पदार्थ : (हर्यश्वम्) शीघ्र हरण करनेवाले अश्ववाला (सत्पतिम्) सज्जनों का पालक (चर्षणीसहम्) अपने प्रतिपक्षियों को दुःख सहानेवाले उस शूर को (स, हि, स्म) वही मनुष्य प्राप्त कर सकता है, (यः) जो (अमन्दत) धनादि से हर्षपूर्ण हो (सः, मघवा) वह धनवान् सेनापति (स्तोतृभ्यः, नः) स्तुति करनेवाले हम लोगों को (तु) शीघ्र (शतम्) अनेक प्रकार की (गव्यम्, अश्व्यम्) गवाश्वादि पदार्थों से संकुल समृद्धि को (वयति) प्राप्त कराये ॥१०॥

भावार्थ : भाव यह है कि अनेक प्रकार की सम्पत्ति की प्राप्ति करानेवाले उस सेनापति की रक्षा से सुरक्षित होकर समृद्धिशाली प्रजाजन ही उसका आह्वान तथा यजन करते हैं, इसलिये सब प्रजाओं को समृद्ध होने के लिये उसकी प्रार्थना करनी चाहिये ॥१० ॥