Rigveda / 8 / 22 / 8
अ॒यं वा॒मद्रि॑भिः सु॒तः सोमो॑ नरा वृषण्वसू । आ या॑तं॒ सोम॑पीतये॒ पिब॑तं दा॒शुषो॑ गृ॒हे ॥
Veda : Rigveda | Mandal : 8 | Sukta : 22 | Mantra No : 8
In English:
Seer : sobhariH kaaNvaH | Devta : ashvinau | Metre : anuShTup | Tone : gaandhaaraH
Subject : English Translation will be uploaded as and when ready
Verse : aya.m vaamadribhiH sutaH somo naraa vRRiShaNvasuu . aa yaata.m somapiitaye pibata.m daashuSho gRRihe .
Component Words : ayam . vaam . adri.abhiH . sutaH . somaH . naraa . vRRiShaNvasuu iti vRRiShaN.avasuu . aa . yaatam . soma.apiitaye . pibatam . daashuShaH . gRRihe . 8.22.8
In Hindi:
ऋषि : सोभरिः काण्वः | देवता : अश्विनौ | छन्द : अनुष्टुप् | स्वर : गान्धारः
विषय :
पदपाठ : अ॒यम् । वा॒म् । अद्रि॑ऽभिः । सु॒तः । सोमः॑ । न॒रा॒ । वृ॒ष॒ण्व॒सू॒ इति॑ वृषण्ऽवसू । आ । या॒त॒म् । सोम॑ऽपीतये । पिब॑तम् । दा॒शुषः॑ । गृ॒हे ॥ ८.२२.८
पदार्थ : (वृषण्वसू) हे धनों की वर्षा करनेवाले (नरा) नेता ! (अद्रिभिः, सुतः) विदारण साधन शक्तियों से सिद्ध किया गया (अयम्, वाम्, सोमः) यह आपका सोमरस उपस्थित है, अतः (सोमपीतये) सोमपानार्थ (आयातम्) आवें (दाशुषः) आपकी सेवा में उत्पन्न याज्ञिक के (गृहे) गृह में (पिबतम्) पान करें ॥८॥
भावार्थ : हे सम्पूर्ण ऐश्वर्य्यों के प्रदाता नेता पुरुषो ! हम याज्ञिक आपका सत्कार करते हैं । आप हमारे यज्ञसदन को प्राप्त होकर उपर्युक्त प्रकार से सिद्ध किये हुए सोमरस का पान कर हमें उत्साहित करें, ताकि हम अपने कर्म करने में सदा सन्नद्ध रहें ॥८ ॥
In Sanskrit:
ऋषि : सोभरिः काण्वः | देवता : अश्विनौ | छन्द : अनुष्टुप् | स्वर : गान्धारः
पदपाठ : अ॒यम् । वा॒म् । अद्रि॑ऽभिः । सु॒तः । सोमः॑ । न॒रा॒ । वृ॒ष॒ण्व॒सू॒ इति॑ वृषण्ऽवसू । आ । या॒त॒म् । सोम॑ऽपीतये । पिब॑तम् । दा॒शुषः॑ । गृ॒हे ॥ ८.२२.८
भावार्थ :