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Rigveda / 8 / 22 / 12

ताभि॒रा या॑तं वृष॒णोप॑ मे॒ हवं॑ वि॒श्वप्सुं॑ वि॒श्ववा॑र्यम् । इ॒षा मंहि॑ष्ठा पुरु॒भूत॑मा नरा॒ याभि॒: क्रिविं॑ वावृ॒धुस्ताभि॒रा ग॑तम् ॥

Veda : Rigveda | Mandal : 8 | Sukta : 22 | Mantra No : 12

In Hindi:

ऋषि : सोभरिः काण्वः | देवता : अश्विनौ | छन्द : निचृत्त्रिष्टुप् | स्वर : धैवतः

विषय :

पदपाठ : ताभिः॑ । आ । या॒त॒म् । वृ॒ष॒णा॒ । उप॑ । मे॒ । हव॑म् । वि॒श्वऽप्सु॑म् । वि॒श्वऽवा॑र्यम् । इ॒षा । मंहि॑ष्ठा । पु॒रु॒ऽभूत॑मा । न॒रा॒ । याभिः॑ । क्रिवि॑म् । व॒वृ॒धुः । ताभिः॑ । आ । ग॒त॒म् ॥ ८.२२.१२

पदार्थ : (वृषणा) हे कामों की वर्षा करनेवाले (इषा) सबको चाहनेवाले (मंहिष्ठा) अतिशय पूजनीय (पुरुभूतमा) अनेकों को परिभव प्राप्त करानेवाले (नरा) नेताओ ! आप (विश्वप्सुम्) अनेकरूपवाले (विश्ववार्यम्) सबके अभिलषित (मे, हवम्, उप) मेरे आह्वान के समीप (ताभिः, आयातम्) उन पूर्वोक्त रक्षाओं सहित (याभिः) जिन रक्षाओं से (क्रिविम्) कूपादि जलाशयों को निर्माण करके (वावृधुः) बढ़ाते हैं (ताभिः) उन रक्षाओं सहित (आगतम्) आवें ॥१२॥

भावार्थ : कूप तड़ागादि जलाशयों को निर्माण कर प्रजाओं को सुख देनेवाले, प्रजाओं की शुभ कामनाओं को पूर्ण करनेवाले, कतिपय प्रजाजनों को ऐश्वर्य्यशाली बनानेवाले और यज्ञों का सर्वत्र प्रचार तथा विस्तार करनेवाले न्यायाधीश तथा सेनाधीश ! हम स्तुतिपूर्वक आपको आह्वान करते हैं, आप हमारे यज्ञ में सम्मिलित हों ॥१२ ॥