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Rigveda / 8 / 23 / 10

अच्छा॑ नो॒ अङ्गि॑रस्तमं य॒ज्ञासो॑ यन्तु सं॒यत॑: । होता॒ यो अस्ति॑ वि॒क्ष्वा य॒शस्त॑मः ॥

Veda : Rigveda | Mandal : 8 | Sukta : 23 | Mantra No : 10

In Hindi:

ऋषि : विश्वमना वैयश्वः | देवता : अग्निः | छन्द : निचृदुष्णिक् | स्वर : ऋषभः

विषय :

पदपाठ : अच्छ॑ । नः॒ । अङ्गि॑रःऽतमम् । य॒ज्ञासः॑ । य॒न्तु॒ । स॒म्ऽयतः॑ । होता॑ । यः । अस्ति॑ । वि॒क्षु । आ । य॒शःऽत॑मः ॥ ८.२३.१०

पदार्थ : (संयतः) सम्यक् रक्षित (नः, यज्ञासः) हमारे यज्ञ (अङ्गिरस्तमम्) प्राणसदृश उस शूर के (अच्छ, यन्तु) अभिमुख प्राप्त हों (यः, यशस्तमः) जो अत्यन्त यशस्वी (विक्षु) प्रजाओं में (आहोता, अस्ति) यज्ञनिष्पादक है ॥१०॥

भावार्थ : भाव यह है कि जिस प्रकार प्राण शरीर के सब अङ्गों का संरक्षक होता है, या यों कहो कि सब अङ्गों में सारभूत प्राण ही कहा जाता है, इसी प्रकार यज्ञ की रक्षा करनेवाले वीरपुरुष यज्ञ के प्राणसदृश हैं, अतएव प्रजाजनों को उचित है कि जिस प्रकार योगीजन प्राणविद्या द्वारा प्राणों को वशीभूत करके अभिनिवेशादि पाँच क्लेशों से रहित हो जाते हैं, इसी प्रकार प्राणरूप वीरों की विद्या द्वारा अविद्यादि पाँच क्लेशों से रहित होना प्रजाजनों का मुख्योद्देश्य होना चाहिये, ताकि सुख का अनुभव करते हुए मनुष्यजीवन को उच्च बनावें ॥१० ॥