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Rigveda / 8 / 23 / 13

यद्वा उ॑ वि॒श्पति॑: शि॒तः सुप्री॑तो॒ मनु॑षो वि॒शि । विश्वेद॒ग्निः प्रति॒ रक्षां॑सि सेधति ॥

Veda : Rigveda | Mandal : 8 | Sukta : 23 | Mantra No : 13

In Hindi:

ऋषि : विश्वमना वैयश्वः | देवता : अग्निः | छन्द : उष्णिक् | स्वर : ऋषभः

विषय :

पदपाठ : यत् । वै । ऊँ॒ इति॑ । वि॒श्पतिः॑ । शि॒तः । सुऽप्री॑तः । मनु॑षः । वि॒शि । विश्वा॑ । इत् । अ॒ग्निः । प्रति॑ । रक्षां॑सि । से॒ध॒ति॒ ॥ ८.२३.१३

पदार्थ : (विश्पतिः, शितः) प्रजाओं का पालक तीक्ष्णक्रियावाला वह (अग्निः) आग्नेय शस्त्रवेत्ता विद्वान् (यद्वा, उ) जब ही (सुप्रीतः) सुप्रसन्न होता है, तब (मनुषः, विशि) मनुष्य के गृह में (विश्वा, इत्, रक्षांसि) सकल राक्षसों को (प्रतिसेधति) निकाल देता है ॥१३॥

भावार्थ : इस मन्त्र का भाव यह है कि जिस देश में अग्निसमान देदीप्यमान योद्धा प्रसन्नचित्त रहते हैं, वहाँ राक्षस दस्युओं का प्रवेश कदापि नहीं हो सकता, अतएव ईश्वर आज्ञा देता है कि हे वैदिक लोगो ! तुम रक्षोहण सूक्तों का पाठ करते हुए अपने क्षत्रियवर्ग की पुष्टि में सदैव दत्तचित्त रहो, ताकि राक्षससमुदाय देश में प्रबल न हो ॥१३ ॥