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Rigveda / 8 / 23 / 21

यो अ॑स्मै ह॒व्यदा॑तिभि॒राहु॑तिं॒ मर्तोऽवि॑धत् । भूरि॒ पोषं॒ स ध॑त्ते वी॒रव॒द्यश॑: ॥

Veda : Rigveda | Mandal : 8 | Sukta : 23 | Mantra No : 21

In Hindi:

ऋषि : विश्वमना वैयश्वः | देवता : अग्निः | छन्द : निचृदुष्णिक् | स्वर : ऋषभः

विषय : अब उक्त यज्ञ का फल कथन करते हैं।

पदपाठ : यः । अ॒स्मै॒ । ह॒व्यदा॑तिऽभिः । आऽहु॑तिम् । मर्तः॑ । अवि॑धत् । भूरि॑ । पोष॑म् । सः । ध॒त्ते॒ । वी॒रऽव॑त् । यशः॑ ॥ ८.२३.२१

पदार्थ : (यः, मर्तः) जो मनुष्य (अस्मै) इसके लिये (हव्यदातिभिः) हव्यपदार्थों का दान करके (आहुतिम्) आह्वान अथवा तृप्ति को (अविधत्) करता है, (सः) वह (भूरि) बहुत से (पोषम्) पोषणोपयोगी अन्न-वस्त्रादि पदार्थ तथा (वीरवत्, यशः) वीर सन्तान सहित कीर्त्ति को (धत्ते) धारण करता है ॥२१॥

भावार्थ : भाव यह है कि जो पुरुष उक्त प्रकार के यज्ञ करते, या यों कहो कि यज्ञ में सत्कारार्ह उपर्युक्त विद्वान् योद्धाओं को आह्वान करके उनका सत्कार करते हैं, वे वीर सन्तानों को लाभ करते और विविध प्रकार के ऐश्वर्य्यों से विभूषित होते हैं ॥२१ ॥