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Rigveda / 8 / 23 / 23

आभि॑र्विधेमा॒ग्नये॒ ज्येष्ठा॑भिर्व्यश्व॒वत् । मंहि॑ष्ठाभिर्म॒तिभि॑: शु॒क्रशो॑चिषे ॥

Veda : Rigveda | Mandal : 8 | Sukta : 23 | Mantra No : 23

In Hindi:

ऋषि : विश्वमना वैयश्वः | देवता : अग्निः | छन्द : पादनिचृदुष्णिक् | स्वर : ऋषभः

विषय :

पदपाठ : आभिः॑ । वि॒धे॒म॒ । अ॒ग्नये॑ । ज्येष्ठा॑भिः । व्य॒श्व॒ऽवत् । मंहि॑ष्ठाभिः । म॒तिऽभिः॑ । शु॒क्रऽशो॑चिषे ॥ ८.२३.२३

पदार्थ : (शुक्रशोचिषे) दीप्तज्योतिवाले (अग्नये) उस शूरपति को (आभिः, ज्येष्ठाभिः) इन अतिदीर्घ (मंहिष्ठाभिः) अतिशय पूजनीय (मतिभिः) स्तुतियों से (व्यश्ववत्) व्यापक शक्तिवाले के समान (विधेम) परिचरण करते हैं ॥२३॥

भावार्थ : उस दिव्य ज्योतिवाले शूरवीर की स्तुतिएँ व्यापक शक्तिसम्पन्न के समान सत्करणीय होती हैं अर्थात् जिस प्रकार विद्युदादि पदार्थ व्यापक शक्तिवाले हैं, इसी प्रकार शूरवीर भी अपनी विस्तृत शक्तियों से बहुव्यापक होता है, जिसका परिचरण करना योग्य है ॥२३ ॥