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Rigveda / 1 / 155 / 6

च॒तुर्भि॑: सा॒कं न॑व॒तिं च॒ नाम॑भिश्च॒क्रं न वृ॒त्तं व्यतीँ॑रवीविपत्। बृ॒हच्छ॑रीरो वि॒मिमा॑न॒ ऋक्व॑भि॒र्युवाकु॑मार॒: प्रत्ये॑त्याह॒वम् ॥

Veda : Rigveda | Mandal : 1 | Sukta : 155 | Mantra No : 6

In Hindi:

ऋषि : दीर्घतमा औचथ्यः | देवता : विष्णुः | छन्द : भुरिक्त्रिष्टुप् | स्वर : धैवतः

विषय : फिर उसी विषय को अगले मन्त्र में कहा है ।

पदपाठ : च॒तुःऽभिः॑। सा॒कम्। न॒व॒तिम्। च॒। नाम॑ऽभिः। च॒क्रम्। न। वृ॒त्तम्। व्यती॑न्। अ॒वी॒वि॒प॒त्। बृ॒हत्ऽश॑रीरः। वि॒ऽमिमा॑नः। ऋक्व॑ऽभिः। युवा॑। अकु॑मारः। प्रति॑। ए॒ति॒। आ॒ऽह॒वम् ॥ १.१५५.६

पदार्थ : जो (विमिमानः) विशेषता से धातुओं की वृद्धि का निर्माण करता हुआ (बृहच्छरीरः) बली स्थूल शरीरवाला (अकुमारः) पच्चीस वर्ष की अवस्था से निकल गया (युवा) किन्तु युवावस्था को प्राप्त ब्रह्मचारी (वृत्तम्) गोल (चक्रम्) चक्र के (न) समान (चतुर्भिः) चार (नामभिः) नामों के (साकम्) साथ (नवतिं, च) और नब्बे अर्थात् चौरानवे नामों से (व्यतीन्) विशेषता से जिनको बल प्राप्त हुआ उन बलवान् योद्धाओं को एक भी (अवीविपत्) अत्यन्त भ्रमाता है वह (ऋक्वभिः) प्रशंसित गुण, कर्म, स्वभावों से (आहवम्) प्रतिष्ठा के साथ बुलाने को (प्रति, एति) प्राप्त होता है ॥ ६ ॥

भावार्थ : इस मन्त्र में उपमालङ्कार है। जो अड़तालीस वर्ष भर अखण्डित ब्रह्मचर्य का सेवन करता है वह इकेला भी गोलचक्र के समान चौरानवे योद्धाओं को भ्रमा सकता है। मनुष्यों में दश वर्ष तक बाल्यावस्था पच्चीस वर्ष तक कुमारावस्था तदनन्तर छब्बीसवें वर्ष के आरम्भ से युवावस्था पुरुष की होती है और सत्रहवें वर्ष से कन्या की युवावस्था का आरम्भ है, इसके उपरान्त जो स्वयंवर विवाह को करते-कराते हैं वे महाभाग्यशाली होते हैं ॥ ६ ॥इस सूक्त में अध्यापकोपदेशक और ब्रह्मचर्य के फल के वर्णन से इसके अर्थ की पिछले सूक्त के अर्थ के साथ सङ्गति है, यह जानना चाहिये ॥यह एकसौ पचपनवाँ सूक्त और पच्चीसवाँ वर्ग पूरा हुआ ॥