Rigveda / 1 / 158 / 4
उप॑स्तुतिरौच॒थ्यमु॑रुष्ये॒न्मा मामि॒मे प॑त॒त्रिणी॒ वि दु॑ग्धाम्। मा मामेधो॒ दश॑तयश्चि॒तो धा॒क्प्र यद्वां॑ ब॒द्धस्त्मनि॒ खाद॑ति॒ क्षाम् ॥
Veda : Rigveda | Mandal : 1 | Sukta : 158 | Mantra No : 4
In English:
Seer : diirghatamaa auchathyaH | Devta : ashvinau | Metre : nichRRittriShTup | Tone : dhaivataH
Subject : English Translation Under Process
Verse : upastutirauchathyamuruShyenmaa maamime patatriNii vi dugdhaam. maa maamedho dashatayashchito dhaakpra yadvaa.m baddhastmani khaadati kShaam .
Component Words : upa.astutiH. auchathyam. uruShyet. maa. maam. ime iti. patatriNii iti. vi. dugdhaam. maa. maam. edhaH. dasha.atayaH. chitaH. dhaak. pra. yat. vaam. baddhaH. tmani. khaadati. kShaam . 1.158.4
In Hindi:
ऋषि : दीर्घतमा औचथ्यः | देवता : अश्विनौ | छन्द : निचृत्त्रिष्टुप् | स्वर : धैवतः
विषय : फिर उसी विषय को अगले मन्त्र में कहा है ।
पदपाठ : उप॑ऽस्तुतिः। औ॒च॒थ्यम्। उ॒रु॒ष्ये॒त्। मा। माम्। इ॒मे इति॑। प॒त॒त्रिणी॒ इति॑। वि। दु॒ग्धा॒म्। मा। माम्। एधः॑। दश॑ऽतयः। चि॒तः। धा॒क्। प्र। यत्। वा॒म्। ब॒द्धः। त्मनि॑। खाद॑ति। क्षाम् ॥ १.१५८.४
पदार्थ : हे सभा शालाधीशो ! (वाम्) तुम दोनों का (यत्) जो (दशतयः) दशगुणा (एधः) इन्धन (बद्धः) निरन्तर युक्त किया और (चितः) संचित किया हुआ अग्नि (क्षाम्) भूमि को (प्र, धाक्) जलावे वैसे (त्मनि) अपने में (माम्) मुझको (मा) मत (खादति) खावे (इमे) ये (पतत्रिणी) नष्ट कराने के लिये कुशिक्षा (औचथ्यम्) उचित उचित कामों में उत्तम (माम्) मुझे (मा) मत (वि, दुग्धाम्) अपूर्ण करें, मेरी परिपूर्णता को मत नष्ट करें और (उपस्तुतिः) समीप प्राप्त हुई स्तुति भी (उरुष्येत्) सेवें ॥ ४ ॥
भावार्थ : इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। जैसे इन्धनों से निर्वात स्थान में अच्छे प्रकार बढ़ा हुआ अग्नि, पृथिवी और काष्ठ आदि पदार्थों को जलाता है, वैसे मुझे शोकरूप अग्नि मत जलावे और अज्ञान वा कुशील मत प्राप्त हों किन्तु शान्ति और विद्या निरन्तर बढ़े ॥ ४ ॥
In Sanskrit:
ऋषि : दीर्घतमा औचथ्यः | देवता : अश्विनौ | छन्द : निचृत्त्रिष्टुप् | स्वर : धैवतः
विषय : पुनस्तमेव विषयमाह ।
पदपाठ : उप॑ऽस्तुतिः। औ॒च॒थ्यम्। उ॒रु॒ष्ये॒त्। मा। माम्। इ॒मे इति॑। प॒त॒त्रिणी॒ इति॑। वि। दु॒ग्धा॒म्। मा। माम्। एधः॑। दश॑ऽतयः। चि॒तः। धा॒क्। प्र। यत्। वा॒म्। ब॒द्धः। त्मनि॑। खाद॑ति। क्षाम् ॥ १.१५८.४
पदार्थ : (उपस्तुतिः) उपगता चासौ स्तुतिः (औचथ्यम्) उचितेषूचितेषु कर्मसु साधुम् (उरुष्येत्) सेवेत (मा) निषेधे (माम्) (इमे) विद्याप्रशंसे (पतत्रिणी) पतितुं विनाशयितुं कुशिक्षे (वि) (दुग्धाम्) प्रपिपूर्त्तम् (मा) (माम्) (एधः) इन्धनम् (दशतयः) दशगुणितः (चितः) संचितः (धाक्) दहेत्। अत्र मन्त्रे घसेत्यादिना लेर्लुग् बहुलं छन्दसीत्यडभावः। (प्र) (यत्) यः (वाम्) युवयोः (बद्धः) नियुक्तः (त्मनि) आत्मनि (खादति) खादेत् (क्षाम्) भूमिम् ॥ ४ ॥
अन्वय : हे सभाशालेशौ वां यद्यो दशतय एधो बद्धश्चितोऽग्निः क्षां प्रधाक् तथा त्मनि मां मा खादति। इमे पतत्रिणी औचथ्यं मां मा विदुग्धामुपस्तुतिश्चोरुष्येत् ॥ ४ ॥
भावार्थ : अत्र वाचकलुप्तोपमालङ्कारः। यथा इन्धनैर्निर्वातस्थाने प्रवृद्धोऽग्निः पृथिवीं काष्ठादीनि वा दहति तथा मां शोकाग्निर्मा दहतु। अज्ञानकुशीले मा प्राप्नुतां किन्तु शान्तिर्विद्या च सततं वर्द्धताम् ॥ ४ ॥