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Rigveda / 1 / 162 / 18

चतु॑स्त्रिंशद्वा॒जिनो॑ दे॒वब॑न्धो॒र्वङ्क्री॒रश्व॑स्य॒ स्वधि॑ति॒: समे॑ति। अच्छि॑द्रा॒ गात्रा॑ व॒युना॑ कृणोत॒ परु॑ष्परुरनु॒घुष्या॒ वि श॑स्त ॥

Veda : Rigveda | Mandal : 1 | Sukta : 162 | Mantra No : 18

In Hindi:

ऋषि : दीर्घतमा औचथ्यः | देवता : मित्रादयो लिङ्गोक्ताः | छन्द : त्रिष्टुप् | स्वर : धैवतः

विषय : फिर उसी विषय को अगले मन्त्र में कहा है ।

पदपाठ : चतुः॑ऽत्रिंशत्। वा॒जिनः॑। दे॒वऽब॑न्धोः। वङ्क्रीः॑। अश्व॑स्य। स्वऽधि॑तिः। सम्। ए॒ति॒। अच्छि॑द्रा। गात्रा॑। व॒युना॑। कृ॒णो॒त॒। परुः॑ऽपरुः। अ॒नु॒ऽघुष्य॑। वि। श॒स्त॒ ॥ १.१६२.१८

पदार्थ : हे विद्वान् जन ! तुम (देवबन्धोः) प्रकाशमान पृथिव्यादिकों के सम्बन्धी (वाजिनः) वेगवाले (अश्वस्य) शीघ्रगामी अग्नि की जो (स्वधितिः) बिजुली (समेति) अच्छे प्रकार जाती है उसको और (चतुस्त्रिंशत्) चौंतीस प्रकार की (वङ्क्रीः) टेढ़ी-बेढ़ी गतियों को (विशस्त) तड़काओ अर्थात् कलों को ताड़ना दे उन गतियों को निकालो। तथा (परुष्परुः) प्रत्येक मर्मस्थल पर (अनुघुष्य) अनुकूलता से कलायन्त्रों का शब्द कराकर (अच्छिद्रा) दो टूंक होने छिन्न-भिन्न होने से रहित (गात्रा) अङ्ग और (वयुना) उत्तम ज्ञान कर्मों को (कृणोत) करो ॥ १८ ॥

भावार्थ : हे मनुष्यो ! जिस कारण से बिजुली उत्पन्न होती है, वह कारण सब पृथिव्यादिकों में व्याप्त है। इससे बिजुली की ताड़ना आदि से किसी का अङ्ग-भङ्ग न हो उतनी बिजुली काम में लाओ। जो अग्नि के गुणों को जानकर यथायोग्य क्रिया से उस अग्नि का प्रयोग किया जाय तो कौन काम न सिद्ध होने योग्य हों अर्थात् सभी यथेष्ट काम बनें ॥ १८ ॥